महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमय उवाच
अस्मात् कृष्णात् सुसंरब्धात् पावकाच्च दिधक्षतः ।
त्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३ ॥
**मयासुर बोला—**कुन्तीनन्दन! आपने अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन भगवान् श्रीकृष्णसे तथा जला डालनेकी इच्छावाले अग्निदेवसे भी मेरी रक्षा की है। अतः बताइये, मैं (इस उपकारके बदले) आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३ ॥
अर्जुन उवाच
कृतमेव त्वया सर्वं स्वस्ति गच्छ महासुर ।
प्रीतिमान् भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वयं च ते ॥ ४ ॥
**अर्जुनने कहा—**असुरराज! तुमने इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करके मेरे उपकारका मानो सारा बदला चुका दिया। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम जाओ। मुझपर प्रेम बनाये रखना। हम भी तुम्हारे प्रति सदा स्नेहका भाव रखेंगे ॥ ४ ॥
मय उवाच
युक्तमेतत् त्वयि विभो यथाऽऽत्थ पुरुषर्षभ ।
प्रीतिपूर्वमहं किंचित् कर्तुमिच्छामि भारत ॥ ५ ॥