महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! तब मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णसे काम बतानेका अनुरोध किया। उसके प्रेरणा करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अनुमानतः दो घड़ीतक विचार किया कि 'इसे कौन-सा काम बताया जाय?' ।। ९ ।।
ततो विचिन्त्य मनसा लोकनाथः प्रजापतिः । चोदयामास तं कृष्णः सभा वै क्रियतामिति ।। १० ।। यदि त्वं कर्तुकामोऽसि प्रियं शिल्पवतां वर । धर्मराजस्य दैतेय यादृशीमिह मन्यसे ।। ११ ।।
तदनन्तर मन-ही-मन कुछ सोचकर प्रजापालक लोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा—‘शिल्पियोंमें श्रेष्ठ दैत्यराज मय! यदि तुम मेरा कोई प्रिय कार्य करना चाहते हो तो तुम धर्मराज युधिष्ठिरके लिये जैसा ठीक समझो, वैसा एक सभाभवन बना दो ।। १०-११ ।।
यां कृतां नानुकुर्वन्ति मानवाः प्रेक्ष्य विस्मिताः । मनुष्यलोके सकले तादृशीं कुरु वै सभाम् ।। १२ ।।
‘वह सभाभवन ऐसा बनाओ, जिसके बन जानेपर सम्पूर्ण मनुष्यलोकके मानव देखकर विस्मित हो जायँ एवं कोई उसकी नकल न कर सके ।। १२ ।।
यत्र दिव्यानभिप्रायान् पश्येम हि कृतांस्त्वया । आसुरान् मानुषांश्चैव सभां तां कुरु वै मय ।। १३ ।।
‘मयासुर! तुम ऐसे सभाभवनका निर्माण करो, जिसमें हम तुम्हारे द्वारा अंकित देवता, असुर और मनुष्योंकी शिल्पनिपुणताका दर्शन कर सकें’ ।। १३ ।।
वैशम्पायन उवाच
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सम्प्रहृष्टो मयस्तदा । विमानप्रतिमां चक्रे पाण्डवस्य शुभां सभाम् ।। १४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके मयासुर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके लिये विमान-जैसी सुन्दर सभाभवन बनानेका निश्चय किया ।। १४ ।।
ततः कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजे युधिष्ठिरे । सर्वमेतत् समावेद्य दर्शयामासतुर्मयम् ।। १५ ।।
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको ये सब बातें बताकर मयासुरको उनसे मिलाया ।। १५ ।।
तस्मै युधिष्ठिरः पूजां यथार्हमकरोत् तदा । स तु तां प्रतिजग्राह मयः सत्कृत्य भारत ।। १६ ।।