महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1610, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की॥ १४-१५॥
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः।
अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम्॥ १६॥
उस समय श्रीकृष्णका रथ हाँकनेवाले सारथियोंमें श्रेष्ठ दारुकको हटाकर उसके स्थानमें राजा युधिष्ठिर प्रेमपूर्वक भगवान्के साथ रथपर जा बैठे॥ १६॥
अभीषून् सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा।
उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं सितम्॥ १७॥
रुक्मदण्डं बृहद्बाहुर्विधुधाव प्रदक्षिणम्।
कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे॥ १७ १/२॥
तथैव भीमसेनोऽपि यमाभ्यां सहितो बली॥ १८॥
पृष्ठतोऽनुययौ कृष्णमृत्विक्पौरजनैः सह।
(छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्।
वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम्॥
दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छाङ्गिधन्वने।