महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1622, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
ततः प्रवेशं तस्यां चक्रे राजा युधिष्ठिरः । अयुतं भोजयित्वा तु ब्राह्मणानां नराधिपः ॥ १ ॥ साज्येन पायसेनैव मधुना मिश्रितेन च । कृसरेणाथ जीवन्त्या हविष्येण च सर्वशः ॥ २ ॥ भक्ष्यप्रकारैर्विविधैः फलैश्चापि तथा नृप । चोष्यैश्च विविधै राजन् पेयैश्च बहुविस्तरैः ॥ ३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया ॥ १—३ ॥
अहतैश्चैव वासोभिर्माल्यैरुच्चावचैरपि । तर्पयामास विप्रेन्द्रान् नानादिग्भ्यः समागतान् ॥ ४ ॥ उन्होंने नये-नये वस्त्र और छोटे-बड़े अनेक प्रकारके हार आदिके उपहार देकर अनेक दिशाओंसे आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया ॥ ४ ॥
ददौ तेभ्यः सहस्राणि गवां प्रत्येकशः पुनः । पुण्याहघोषस्तत्रासीद् दिवस्पृगिव भारत ॥ ५ ॥ भारत! तत्पश्चात् उन्होंने प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक हजार गौएँ दीं। उस समय वहाँ ब्राह्मणोंके पुण्याह-वाचनका गम्भीर घोष मानो स्वर्गलोकतक गूँज उठा ॥ ५ ॥
वादित्रैर्विविधैर्दिव्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि । पूजयित्वा कुरुश्रेष्ठो दैवतानि निवेश्य च ॥ ६ ॥ कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने अनेक प्रकारके बाजे तथा भाँति-भाँतिके दिव्य सुगन्धित पदार्थोंद्वारा उस भवनमें देवताओंकी स्थापना एवं पूजा की। इसके बाद वे उस भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ६ ॥
तत्र मल्ला नटा झल्लाः सूता वैतालिकास्तथा । उपतस्थुर्महात्मानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ७ ॥ वहाँ धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें कितने ही मल्ल (बाहुयुद्ध करनेवाले), नट, झल्ल (लकुटियोंसे युद्ध करनेवाले), सूत और वैतालिक उपस्थित हुए ॥ ७ ॥
तथा स कृत्वा पूजां तां भ्रातृभिः सह पाण्डवः । तस्यां सभायां रम्यायां रेमे शक्रो यथा दिवि ॥ ८ ॥ इस प्रकार पूजनका कार्य सम्पन्न करके भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति उस रमणीय सभामें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ८ ॥
सभायामृषयस्तस्यां पाण्डवैः सह आसते ।