महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकच्चिदाचरितं पूर्वैर्नरदेव पितामहैः । वर्तसे वृत्तिमक्षुद्रां धर्मार्थसहितां त्रिषु ॥ १८ ॥ नरदेव! क्या तुम ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र—इन तीनों वर्णोंकी प्रजाओंके प्रति अपने पिता-पितामहोंद्वारा व्यवहारमें लायी हुई धर्मार्थयुक्त उत्तम एवं उदार वृत्तिका व्यवहार करते हो? ॥ १८ ॥
कच्चिदर्थेन वा धर्मं धर्मेणार्थमथापि वा । उभौ वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रबाधसे ॥ १९ ॥ तुम धनके लोभमें पड़कर धर्मको, केवल धर्ममें ही संलग्न रहकर धनको अथवा आसक्ति ही जिसका बल है, उस कामभोगके सेवनद्वारा धर्म और अर्थ दोनोंको ही हानि तो नहीं पहुँचाते? ॥ १९ ॥
कच्चिदर्थं च धर्मं च कामं च जयतां वर । विभज्य काले कालज्ञः सदा वरद सेवसे ॥ २० ॥ विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ एवं वरदायक नरेश! तुम त्रिवर्गसेवनके उपयुक्त समयका ज्ञान रखते हो; अतः कालका विभाग करके नियत और उचित समयपर सदा धर्म, अर्थ एवं कामका सेवन करते हो न? ॥ २० ॥१-
कच्चिद् राजगुणैः षड्भिः सप्तोपायांस्तथानघ । बलाबलं तथा सम्यक् चतुर्दश परीक्षसे ॥ २१ ॥ निष्पाप युधिष्ठिर! क्या तुम राजोचित छः२ गुणोंके द्वारा सात३ उपायोंकी, अपने और शत्रुके बलाबलकी तथा देशपाल, दुर्गपाल आदि चौदह४ व्यक्तियोंकी भलीभाँति परख करते रहते हो? ॥ २१ ॥
कच्चिदात्मानमन्वीक्ष्य परांश्च जयतां वर । तथा संधाय कर्माणि अष्टौ भारत सेवसे ॥ २२ ॥ विजेताओंमें श्रेष्ठ भरतवंशी युधिष्ठिर! क्या तुम अपनी और शत्रुकी शक्तिको अच्छी तरह समझकर यदि शत्रु प्रबल हुआ तो उसके साथ संधि बनाये रखकर अपने धन और कोषकी वृद्धिके लिये आठ५ कर्मोंका सेवन करते हो? ॥ २२ ॥
कच्चित् प्रकृतयः सप्त न लुप्ता भरतर्षभ । आढ्यास्तथा व्यसनिनः स्वनुरक्ताश्च सर्वशः ॥ २३ ॥ भरतश्रेष्ठ! तुम्हारी मन्त्री आदि सात६ प्रकृतियाँ कहीं शत्रुओंमें मिल तो नहीं गयी हैं? तुम्हारे राज्यके धनीलोग बुरे व्यसनोंसे बचे रहकर सर्वथा तुमसे प्रेम करते हैं न? ॥ २३ ॥
कच्चिन्न कृतकैर्दूतैर्ये चाप्यपरिशङ्किताः । त्वत्तो वा तव चामात्यैर्भिद्यते मन्त्रितं तथा ॥ २४ ॥