भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1640

अप्राप्तव्यवहारा वा तव कर्मस्वनुष्ठिताः ।। ७६ ।।
राजन्! तुमने ऐसे लोगोंको तो अपने कामोंपर नहीं लगा रखा है? जो लोभी, चोर, शत्रु अथवा व्यावहारिक अनुभवसे सर्वथा शून्य हों? ।। ७६ ।।
कच्चिन्न चौरैर्लुब्धैर्वा कुमारैः स्त्रीबलेन वा ।
त्वया वा पीड्यते राष्ट्रं कच्चित् तुष्टाः कृषीवलाः ।। ७७ ।।
चोरों, लोभियों, राजकुमारों या राजकुलकी स्त्रियोंद्वारा अथवा स्वयं तुमसे ही तुम्हारे राष्ट्रको पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है? क्या तुम्हारे राज्यके किसान संतुष्ट हैं? ।। ७७ ।।
कच्चिद् राष्ट्रे तडागानि पूर्णानि च बृहन्ति च ।
भागशो विनिविष्टानि न कृषिर्देवमातृका ।। ७८ ।।
क्या तुम्हारे राज्यके सभी भागोंमें जलसे भरे हुए बड़े-बड़े तालाब बनवाये गये हैं? केवल वर्षाके पानीके भरोसे ही तो खेती नहीं होती है? ।। ७८ ।।
कच्चिन्न भक्तं बीजं च कर्षकस्यावसीदति ।
प्रत्येकं च शतं वृद्ध्या ददास्यृणमनुग्रहम् ।। ७९ ।।
तुम्हारे राज्यके किसानका अन्न या बीज तो नष्ट नहीं होता? क्या तुम प्रत्येक किसानपर अनुग्रह करके उसे एक रुपया सैकड़े ब्याजपर ऋण देते हो? ।। ७९ ।।
कच्चित् स्वनुष्ठिता तात वार्ता ते साधुभिर्जनैः ।
वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते ।। ८० ।।
तात! तुम्हारे राष्ट्रमें अच्छे पुरुषोंद्वारा वार्ता—कृषि, गोरक्षा तथा व्यापारका काम अच्छी तरह किया जाता है न? क्योंकि उपर्युक्त वार्तावृत्तिपर अवलम्बित रहनेवाले लोग ही सुखपूर्वक उन्नति करते हैं ।। ८० ।।
कच्चिच्छूराः कृतप्रज्ञाः पञ्च पञ्च स्वनुष्ठिताः ।
क्षेमं कुर्वन्ति संहत्य राजञ्जनपदे तव ।। ८१ ।।
राजन्! क्या तुम्हारे जनपदके प्रत्येक गाँवमें शूरवीर, बुद्धिमान् और कार्यकुशल पाँच-पाँच पंच मिलकर सुचारुरूपसे जनहितके कार्य करते हुए सबका कल्याण करते हैं? ।। ८१ ।।
कच्चिन्नगरगुप्त्यर्थं ग्रामा नगरवत् कृताः ।
ग्रामवच्च कृताः प्रान्तास्ते च सर्वे त्वदर्पणाः ।। ८२ ।।
क्या नगरोंकी रक्षाके लिये गाँवोंको भी नगरके ही समान बहुत-से शूरवीरोंद्वारा सुरक्षित कर दिया गया है? सीमावर्ती गाँवोंको भी अन्य गाँवोंकी भाँति सभी सुविधाएँ दी गयी हैं? तथा क्या वे सभी प्रान्त, ग्राम और नगर तुम्हें (कर-रूपमें एकत्र किया हुआ) धन समर्पित करते हैं?³ ।। ८२ ।।