महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! उस दिव्य सभामें सभी मरुद्गण और गृहवासी देवता सौ यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेनेवाले महात्मा इन्द्रकी प्रतिदिन सेवा करते हैं॥ ६॥ सिद्धा देवर्षयश्चैव साध्या देवगणास्तथा । मरुत्वन्तश्च सहिता भास्वन्तो हेममालिनः ॥ ७ ॥ एते सानुचराः सर्वे दिव्यररूपाः स्वलंकृताः । उपासते महात्मानं देवराजमरिंदमम् ॥ ८ ॥ सिद्ध, देवर्षि, साध्यदेवगण तथा मरुत्वान्—ये सभी सुवर्णमालाओंसे सुशोभित हो तेजस्वी रूप धारण किये एक साथ उस दिव्य सभामें बैठकर शत्रुदमन महामना देवराज इन्द्रकी उपासना करते हैं। वे सभी देवता अपने अनुचरों (सेवकों)-के साथ वहाँ विराजमान होते हैं। वे दिव्यरूपधारी होनेके साथ ही उत्तमोत्तम अलंकारोंसे अलंकृत रहते हैं॥ ७-८॥ तथा देवर्षयः सर्वे पार्थ शक्रमुपासते । अमला धूतपाप्मानो दीप्यमाना इवाग्नयः ॥ ९ ॥ कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार जिनके पाप धुल गये हैं, वे अग्निके समान उद्दीप्त होनेवाले सभी निर्मल देवर्षि वहाँ इन्द्रकी उपासना करते हैं॥ ९॥ तेजस्विनः सोमसुतो विशोका विगतज्वराः । वे देवर्षिगण तेजस्वी, सोमयाग करनेवाले तथा शोक और चिन्तासे शून्य हैं॥ ९ १/२ ॥ पराशरः पर्वतश्च तथा सावर्णिगालवौ ॥ १० ॥ शङ्खश्च लिखितश्चैव तथा गौरशिरा मुनिः । दुर्वासाः क्रोधनः श्येनस्तथा दीर्घतमा मुनिः ॥ ११ ॥ पवित्रपाणिः सावर्णिर्याज्ञवल्क्योऽथ भालुकिः । उद्दालकः श्वेतकेतुस्ताण्ड्यो भाण्डायनिस्तथा ॥ १२ ॥ हविष्मांश्च गरिष्ठश्च हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः । हृद्यश्चोदरशाण्डिल्यः पाराशर्यः कृषीवलः ॥ १३ ॥ वातस्कन्धो विशाखश्च विधाता काल एव च । करालदन्तस्त्वष्टा च विश्वकर्मा च तुम्बुरुः ॥ १४ ॥ अयोनिजा योनिजाश्च वायुभक्षा हुताशिनः । ईशानं सर्वलोकस्य वज्रिणं समुपासते ॥ १५ ॥ पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्, गरिष्ठ, राजा हरिश्चन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु—ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य-