महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1664, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्राङ्गदाश्चित्रमाल्याः सर्वे ज्वलितकुण्डलाः । सुकृतैः कर्मभिः पुण्यैः पारिबर्हेश्च भूषिताः ॥ ३७ ॥ सभी अद्भुत बाजूबंद, विचित्र हार और जगमगाते हुए कुण्डल धारण करते हैं। वे अपने पवित्र शुभ कर्मों तथा वस्त्राभूषणोंसे भी विभूषित होते हैं ॥ ३७ ॥
गन्धर्वाश्च महात्मानः सङ्घशश्चाप्सरोगणाः । वादित्रं नृत्यगीतं च हास्यं लास्यं च सर्वशः ॥ ३८ ॥ कितने ही महामना गन्धर्व और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ उस सभामें उपस्थित हो सब प्रकारके वाद्य, नृत्य, गीत, हास्य और लास्यकी उत्तम कलाका प्रदर्शन करती हैं ॥ ३८ ॥
पुण्याश्च गन्धाः शब्दाश्च तस्यां पार्थ समन्ततः । दिव्यानि चैव माल्यानि उपतिष्ठन्ति नित्यशः ॥ ३९ ॥ कुन्तीकुमार! उस सभामें सदा सब ओर पवित्र गन्ध, मधुर शब्द और दिव्य मालाओंके सुखद स्पर्श प्राप्त होते रहते हैं ॥ ३९ ॥
शतं शतसहस्राणि धर्मिणां तं प्रजेश्वरम् । उपासते महात्मानं रूपयुक्ता मनस्विनः ॥ ४० ॥ सुन्दर रूप धारण करनेवाले एक करोड़ धर्मात्मा एवं मनस्वी पुरुष महात्मा यमकी उपासना करते हैं ॥ ४० ॥
ईदृशी सा सभा राजन् पितृराज्ञो महात्मनः । वरुणस्यापि वक्ष्यामि सभां पुष्करमालिनीम् ॥ ४१ ॥ राजन्! पितृराज महात्मा यमकी सभा ऐसी ही है। अब मैं वरुणकी मूर्तिमान् पुष्कर आदि तीर्थमालाओंसे सुशोभित सभाका भी वर्णन करूँगा ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि यमसभावर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें यमसभा-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
* नीलकण्ठने अपनी टीकामें इन सत्ताईस पावकोंके नाम इस प्रकार बताये हैं—अंगिरा, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, आहवनीयाग्नि, निर्मन्ध्य, वैद्युत, शूर, संवर्त, लौकिक, जठराग्नि, विषग, क्रव्यात्, क्षेमवान्, वैष्णव, दस्युमान्, बलद, शान्त, पुष्ट, विभावसु, ज्योतिष्मान्, भरत, भद्र, स्विष्टकृत्, वसुमान्, क्रतु, सोम और पितृमान्।