भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1686

ये चान्ये च महीपाला राजसूयं महाक्रतुम् । यजन्ते ते सहेन्द्रेण मोदन्ते भरतर्षभ ॥ २० ॥ भरतकुलभूषण! दूसरे भी जो भूपाल राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वे देवराज इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ॥ २० ॥

ये चापि निधनं प्राप्ताः संग्रामेष्वपलायिनः । ते तत् सदनमासाद्य मोदन्ते भरतर्षभ ॥ २१ ॥ भरतर्षभ! जो लोग संग्राममें पीठ न दिखाकर वहीं मृत्युका वरण कर लेते हैं, वे भी देवराज इन्द्रकी उस सभामें जाकर वहाँ आनन्दका उपभोग करते हैं ॥ २१ ॥

तपसा ये च तीव्रेण त्यजन्तीह कलेवरम् । ते तत् स्थानं समासाद्य श्रीमन्तो भान्ति नित्यशः ॥ २२ ॥ तथा जो लोग कठोर तपस्याके द्वारा यहाँ अपने शरीरका त्याग करते हैं, वे भी उस इन्द्रसभामें जाकर तेजस्वीरूप धारण करके सदा प्रकाशित होते रहते हैं ॥ २२ ॥

पिता च त्वाऽऽह कौन्तेय पाण्डुः कौरवनन्दन । हरिश्चन्द्रे श्रियं दृष्ट्वा नृपतौ जातविस्मयः ॥ २३ ॥ कौरवनन्दन कुन्तीकुमार! तुम्हारे पिता पाण्डुने राजा हरिश्चन्द्रकी सम्पत्ति देखकर अत्यन्त चकित हो तुमसे कहनेके लिये संदेश दिया है ॥ २३ ॥

विज्ञाय मानुषं लोकमायान्तं मां नराधिप । प्रोवाच प्रणतो भूत्वा वदेथास्त्वं युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥ नरेश्वर! मुझे मनुष्यलोकमें आता जान उन्होंने प्रणाम करके मुझसे कहा—'देवर्षे! आप युधिष्ठिरसे यह कहियेगा— ॥ २४ ॥

समर्थोऽसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते स्थिता वशे । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहरस्वेति भारत ॥ २५ ॥ 'भारत! तुम्हारे भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं, तुम सारी पृथ्वीको जीतनेमें समर्थ हो; अतः राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान करो ॥ २५ ॥

त्वयीष्टवति पुत्रेऽहं हरिश्चन्द्रवदाशु वै । मोदिष्ये बहुलाः शश्वत् समाः शक्रस्य संसदि ॥ २६ ॥ 'तुम-जैसे पुत्रके द्वारा वह यज्ञ सम्पन्न होनेपर मैं भी शीघ्र ही राजा हरिश्चन्द्रकी भाँति बहुत वर्षोंतक इन्द्रभवनमें आनन्द भोगूँगा' ॥ २६ ॥

एवं भवतु वक्ष्येऽहं तव पुत्रं नराधिपम् । भूलोकं यदि गच्छेयमिति पाण्डुमथाब्रुवम् ॥ २७ ॥ तब मैंने पाण्डुसे कहा—'एवमस्तु, यदि मैं भूलोकमें जाऊँगा तो आपके पुत्र राजा युधिष्ठिरसे कह दूँगा' ॥ २७ ॥

तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र संकल्पं कुरु पाण्डव ।