भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1715

मेरे मनको निरुत्साह कर रहा है ।। ५ ।।

वैशम्पायन उवाच

पार्थः प्राप्य धनुः श्रेष्ठमक्षय्ये च महेषुधी । रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत ।। ६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन उत्तम गाण्डीव धनुष, दो अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वजा और सभा प्राप्त कर चुके थे; इससे उत्साहित होकर वे युधिष्ठिरसे बोले ।। ६ ।।

अर्जुन उवाच

धनुः शस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो बलम् । प्राप्तमेतन्मया राजन् दुष्प्रापं यदभीप्सितम् ।। ७ ।। **अर्जुनने कहा—**राजन्! धनुष, शस्त्र, बाण, पराक्रम, श्रेष्ठ सहायक, भूमि, यश और बलकी प्राप्ति बड़ी कठिनाईसे होती है; किंतु ये सभी दुर्लभ वस्तुएँ मुझे अपनी इच्छाके अनुकूल प्राप्त हुई हैं ।। ७ ।।

कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्याः साधु सुनिश्चिताः । बलेन सदृशं नास्ति वीर्यं तु मम रोचते ।। ८ ।। अनुभवी विद्वान् उत्तम कुलमें जन्मकी बड़ी प्रशंसा करते हैं; परंतु बलके समान वह भी नहीं है। मुझे तो बल-पराक्रम ही श्रेष्ठ जान पड़ता है ।। ८ ।।

कृतवीर्यकुले जातो निर्वीर्यः किं करिष्यति । निर्वीर्ये तु कुले जातो वीर्यवांस्तु विशिष्यते ।। ९ ।। महापराक्रमी राजा कृतवीर्यके कुलमें उत्पन्न होकर भी जो स्वयं निर्बल है, वह क्या करेगा? निर्बल कुलमें जन्म लेकर भी जो बलवान् और पराक्रमी है, वही श्रेष्ठ है ।। ९ ।।

क्षत्रियः सर्वशो राजन् यस्य वृत्तिर्द्विषज्जये । सर्वैर्गुणैर्विहीनोऽपि वीर्यवान् हि तरेद् रिपून् ।। १० ।। महाराज! शत्रुओंको जीतनेमें जिसकी प्रवृत्ति हो, वही सब प्रकारसे श्रेष्ठ क्षत्रिय है। बलवान् पुरुष सब गुणोंसे हीन हो, तो भी वह शत्रुओंके संकटसे पार हो सकता है ।। १० ।।

सर्वैरपि गुणैर्युक्तो निर्वीर्यः किं करिष्यति । गुणीभूता गुणाः सर्वे तिष्ठन्ति हि पराक्रमे ।। ११ ।। जो निर्बल है, वह सर्वगुणसम्पन्न होकर भी क्या करेगा? पराक्रममें सभी गुण उसके अंग बनकर रहते हैं ।। ११ ।।

जयस्य हेतुः सिद्धिर्हि कर्म दैवं च संश्रितम् । संयुक्तो हि बलैः कश्चित् प्रमादान्नोपयुज्यते ।। १२ ।।