महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1720, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतयोर्मध्यगतश्चापि रराज वसुधाधिपः ॥ १९ ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये मूर्तिमानिव सागरः । जब वे दोनों पत्नियोंके बीच विराजमान होते, उस समय ऐसा जान पड़ता, मानो गंगा और यमुनाके बीचमें मूर्तिमान् समुद्र सुशोभित हो रहा है ॥ १९ १/२ ॥ विषयेषु निमग्नस्य तस्य यौवनमभ्यगात् ॥ २० ॥ न च वंशकरः पुत्रस्तस्याजायत कश्चन । मङ्गलैर्बहुभिर्होमैः पुत्रकामाभिरिष्टिभिः । नाससाद नृपश्रेष्ठः पुत्रं कुलविवर्धनम् ॥ २१ ॥ विषयोंमें डूबे हुए राजाकी सारी जवानी बीत गयी, परंतु उन्हें कोई वंश चलानेवाला पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। उन श्रेष्ठ नरेशने बहुत-से मांगलिक कृत्य, होम और पुत्रेष्टियज्ञ कराये, तो भी उन्हें वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई ॥ २०-२१ ॥ अथ काक्षीवतः पुत्रं गौतमस्य महात्मनः । शुश्राव तपसि श्रान्तमुदारं चण्डकौशिकम् ॥ २२ ॥ यदृच्छयाऽऽगतं तं तु वृक्षमूलमुपाश्रितम् । पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वरत्नैर्तोषयत् ॥ २३ ॥ एक दिन उन्होंने सुना कि गौतमगोत्रीय महात्मा काक्षीवान्के पुत्र परम उदार चण्डकौशिक मुनि तपस्यासे उपरत होकर अकस्मात् इधर आ गये हैं और एक वृक्षके नीचे बैठे हैं। यह समाचार पाकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियों (एवं पुरवासियों)-के साथ उनके पास गये तथा सब प्रकारके रत्नों (मुनिजनोचित उत्कृष्ट वस्तुओं)-की भेंट देकर उन्हें संतुष्ट किया ॥ २२-२३ ॥ (बृहद्रथं च स ऋषिः यथावत् प्रत्यनन्दत । उपविष्टश्च तेनाथ अनुज्ञातो महात्मना ॥ तमपृच्छत् तदा विप्रः किमागमनमित्यथ । पौरैरनुगतस्यैव पत्नीभ्यां सहितस्य च ॥ महर्षिने भी यथोचित बर्तावद्वारा बृहद्रथको प्रसन्न किया। उन महात्माकी आज्ञा पाकर राजा उनके निकट बैठे। उस समय ब्रह्मर्षि चण्डकौशिकने उनसे पूछा—'राजन्! अपनी दोनों पत्नियों और पुरवासियोंके साथ यहाँ तुम्हारा आगमन किस उद्देश्यसे हुआ है?'। स उवाच मुनिं राजा भगवन् नास्ति मे सुतः । अपुत्रस्य वृथा जन्म इत्याहुर्मुनि्सत्तम ॥ तब राजाने मुनिसे कहा—'भगवन्! मेरे कोई पुत्र नहीं है। मुनिश्रेष्ठ! लोग कहते हैं कि पुत्रहीन मनुष्यका जन्म व्यर्थ है। तादृशस्य हि राज्येन वृद्धत्वे किं प्रयोजनम् । सोऽहं तपश्चरिष्यामि पत्नीभ्यां सहितो वने ॥