भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1732, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1732

एष रुद्रं महादेवं त्रिपुरान्तकरं हरम् । सर्वलोकेष्वतिबलः साक्षाद् द्रक्ष्यति मागधः ॥ १५ ॥ 'यह मगधराज सम्पूर्ण लोकोंमें अत्यन्त बलवान् होगा और त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले सर्वदुःखहारी महादेव रुद्रकी आराधना करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करेगा' ॥ १५ ॥

एवं ब्रुवन्नेव मुनिः स्वकार्यमिव चिन्तयन् । विसर्जयामास नृपं बृहद्रथमथारिहन् ॥ १६ ॥ शत्रुसूदन नरेश! ऐसा कहकर अपने कार्यके चिन्तनमें लगे हुए मुनिने राजा बृहद्रथको विदा कर दिया ॥ १६ ॥

प्रविश्य नगरीं चापि ज्ञातिसम्बन्धिभिर्वृतः । अभिषिच्य जरासंधं मगधाधिपतिस्तदा ॥ १७ ॥ बृहद्रथो नरपतिः परां निर्वृतिमाययौ । अभिषिक्ते जरासंधे तदा राजा बृहद्रथः । पत्नीद्वयेनानुगतस्तपोवनचरोऽभवत् ॥ १८ ॥ राजधानीमें प्रवेश करके अपने जाति-भाइयों और सगे-सम्बन्धियोंसे घिरे हुए मगधनरेश बृहद्रथने उसी समय जरासंधका राज्याभिषेक कर दिया। ऐसा करके उन्हें बड़ा संतोष हुआ। जरासंधका अभिषेक हो जानेपर महाराज बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें चले गये ॥ १७-१८ ॥

ततो वनस्थे पितरि मात्रोश्चैव विशाम्पते । जरासंधः स्ववीर्येण पार्थिवानकरोद् वशे ॥ १९ ॥ महाराज! दोनों माताओं और पिताके वनवासी हो जानेपर जरासंधने अपने पराक्रमसे समस्त राजाओंको वशमें कर लिया ॥ १९ ॥

वैशम्पायन उवाच

अथ दीर्घस्य कालस्य तपोवनचरो नृपः । सभार्यः स्वर्गमगमत् तपस्तप्त्वा बृहद्रथः ॥ २० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर दीर्घकालतक तपोवनमें रहकर तपस्या करते हुए महाराज बृहद्रथ अपनी पत्नियोंके साथ स्वर्गवासी हो गये ॥ २० ॥

जरासंधोऽपि नृपतिर्यथोक्तं कौशिकेन तत् । वरप्रदानमखिलं प्राप्य राज्यमपालयत् ॥ २१ ॥ इधर जरासंध भी चण्डकौशिक मुनिके कथनानुसार भगवान् शंकरसे सारा वरदान पाकर राज्यकी रक्षा करने लगा ॥ २१ ॥

निहते वासुदेवेन तदा कंसे महीपतौ ।