महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1735, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें(जरासंधवधपर्व)
विंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके अनुमोदन करनेपर श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनकी मगध-यात्रा
वासुदेव उवाच
पतितौ हंसडिम्भकौ कंसश्च सगणो हतः ।
जरासंधस्य निधने कालोऽयं समुपागतः ॥ १ ॥
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**धर्मराज! जरासंधके मुख्य सहायक हंस और डिम्भक यमुनाजीमें डूब मरे। कंस भी अपने सेवकों और सहायकोंसहित कालके गालमें चला गया। अब जरासंधके नाशका यह उचित अवसर आ पहुँचा है ॥ १ ॥
न शक्योऽसौ रणे जेतुं सर्वैरपि सुरासुरैः ।
बाहुयुद्धेन जेतव्यः स इत्युपलभामहे ॥ २ ॥
युद्धमें तो सम्पूर्ण देवता और असुर भी उसे जीत नहीं सकते, अतः मेरी समझमें यही आता है कि उसे बाहुयुद्धके द्वारा जीतना चाहिये ॥ २ ॥
मयि नीतिर्बलं भीमे रक्षिता चावयोरर्ज्यः ।
मागधं साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाग्नयः ॥ ३ ॥
मुझमें नीति है, भीमसेनमें बल है और अर्जुन हम दोनोंकी रक्षा करनेवाले हैं; अतः जैसे तीन अग्नियाँ यज्ञकी सिद्धि करती हैं, उसी प्रकार हम तीनों मिलकर जरासंधके वधका काम पूरा कर लेंगे ॥ ३ ॥
त्रिभिरासादितोऽस्माभिर्विजने स नराधिपः ।
न संदेहो यथा युद्धमेकेनाप्युपयास्यति ॥ ४ ॥
अवमानाच्च लोभाच्च बाहुवीर्याच्च दर्पितः ।
भीमसेनेन युद्धाय ध्रुवमप्युपयास्यति ॥ ५ ॥
जब हम तीनों एकान्तमें राजा जरासंधसे मिलेंगे, तब वह हम तीनोंमेंसे किसी एकके साथ द्वन्द्वयुद्ध करना स्वीकार कर लेगा; इसमें संदेह नहीं है। अपमानके भयसे, बड़े योद्धा भीमसेनके साथ लड़नेके लोभसे तथा अपने बाहुबलसे घमंडमें चूर होनेसे जरासंध निश्चय ही भीमसेनके साथ युद्ध करनेको उद्यत होगा ॥ ४-५ ॥
अलं तस्य महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः ।