भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1741

भजते मागधं वंशं स नृपाणामनुग्रहात् ॥ ६ ॥ इसी कारण वह गौतम मुनि राजाओंके प्रेमसे वहाँ आश्रममें रहता तथा मगधदेशीय राजवंशकी सेवा करता है ॥ ६ ॥ अङ्गवङ्गादयश्चैव राजानः सुमहाबलाः । गौतमक्षयमभ्येत्य रमन्ते स्म पुरार्जुन ॥ ७ ॥ अर्जुन! पूर्वकालमें अंग-वंग आदि महाबली राजा भी गौतमके घरमें आकर आनन्दपूर्वक रहते थे ॥ ७ ॥ वनराजीस्तु पश्येमाः पिप्पलानां मनोरमाः । लोध्राणां च शुभाः पार्थ गौतमौकः समीपजाः ॥ ८ ॥ पार्थ! गौतमके आश्रमके निकट लहलहाती हुई पीपल और लोधोंकी इन सुन्दर एवं मनोरम वन-पंक्तियोंको तो देखो ॥ ८ ॥ अर्बुदः शक्रवापी च पन्नगौ शत्रुतापनौ । स्वस्तिकस्यालयश्चात्र मणिनागस्य चोत्तमः ॥ ९ ॥ यहाँ अर्बुद और शक्रवापी नामवाले दो नाग रहते हैं, जो अपने शत्रुओंको संतप्त करनेवाले हैं। यहीं स्वस्तिक नाग और मणि नागके भी उत्तम भवन हैं ॥ ९ ॥ अपरिहार्या मेघानां मागधा मनुना कृताः । कौशिको मणिमांश्चैव चक्राते चाप्यनुग्रहम् ॥ १० ॥ मनुने मगधदेशके निवासियोंको मेघोंके लिये अपरिहार्य (अनुग्राह्य) कर दिया है; (अतः वहाँ सदा ही बादल समयपर यथेष्ट वर्षा करते हैं।) चण्डकौशिक मुनि और मणिमान् नाग भी मगधदेशपर अनुग्रह कर चुके हैं ॥ १० ॥ (पाण्डरे विपुले चैव तथा वाराहकेऽपि च । चैत्यके च गिरिश्रेष्ठे मातङ्गे च शिलोच्चये ॥ एतेषु पर्वतेन्द्रेषु सर्वसिद्धमहालयाः । यतीनामाश्रमाच्चैव मुनीनां च महात्मनाम् ॥ श्वेतवर्णके वृषभ, विपुल, वाराह, गिरिश्रेष्ठ चैत्यक तथा मातंग गिरि—इन सभी श्रेष्ठ पर्वतोंपर सम्पूर्ण सिद्धोंके विशाल भवन हैं तथा यतियों, मुनियों और महात्माओंके बहुत-से आश्रम हैं। वृषभस्य तमालस्य महावीर्यस्य वै तथा । गन्धर्वरक्षसां चैव नागानां च तथाऽऽलयाः ॥) वृषभ, महापराक्रमी तमाल, गन्धर्वों, राक्षसों तथा नागोंके भी निवासस्थान उन पर्वतोंकी शोभा बढ़ाते हैं। एवं प्राप्य पुरं रम्यं दुराधर्षं समन्ततः । अर्थसिद्धिं त्वनुपमां जरासंधोऽभिमन्यते ॥ ११ ॥