महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1759, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंमथुरानरेश कंस उन सब गोपोंको बहुत सताया करता था। इधर महाबाहु श्रीकृष्ण बड़े होकर तेज और बलसे सम्पन्न हो गये। ततस्ते क्लिश्यमानास्तु पुण्डरीकाक्षमच्युतम् । भयेन कामादपरे गणशः पर्यवारयन् ।। राजाके सताये हुए गोपगण भय तथा कामनासे झुंड-के-झुंड एकत्र हो कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको घेरकर संगठित होने लगे। स तु लब्ध्वा बलं राजन्नुग्रसेनस्य सम्मतः । वसुदेवात्मजः सर्वैर्भ्रातृभिः सहितं पुनः ।। निर्जित्य युधि भोजेन्द्रं हत्वा कंसं महाबलः । अभ्यषिञ्चत् ततो राज्य उग्रसेनं विशाम्पते ।। राजन्! इस प्रकार बलका संग्रह करके महाबली वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने उग्रसेनकी सम्मतिके अनुसार समस्त भाइयोंसहित भोजराज कंसको मारकर पुनः उग्रसेनको ही मथुराके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। ततः श्रुत्वा जरासंधो माधवेन हतं युधि । शूरसेनाधिपं चक्रे कंसपुत्रं तदा नृपः ।। राजन्! जरासंधने जब यह सुना कि श्रीकृष्णने कंसको युद्धमें मार डाला है, तब उसने कंसके पुत्रको शूरसेनदेशका राजा बनाया। स सैन्यं महदुत्थाप्य वासुदेवं प्रसह्य च । अभ्यषिञ्चत् सुतं तत्र सुताया जनमेजय ।। जनमेजय! उसने बड़ी भारी सेना लेकर आक्रमण किया और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको हराकर अपनी पुत्रीके पुत्रको वहाँ राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। उग्रसेनं च वृष्णींश्च महाबलसमन्वितः । स तत्र विप्रकुरुते जरासंधः प्रतापवान् ।। एतद् वैरं कौरवेय जरासंधस्य माधवे । जनमेजय! प्रतापी जरासंध महान् बल और सैनिकशक्तिसे सम्पन्न था। वह उग्रसेन तथा वृष्णिवंशको सदा क्लेश पहुँचाया करता था। कुरुनन्दन! जरासंध और श्रीकृष्णके वैरका यही वृत्तान्त है। आशासितार्थे राजेन्द्र संरुरोध विनिर्जितान् । पार्थिवैस्तैर्नृपतिभिर्यक्ष्यमाणः समृद्धिमान् ।। देवश्रेष्ठं महादेवं कृत्तिवासं त्रियम्बकम् । एतत् सर्वं यथा वृत्तं कथितं भरतर्षभ ।। यथा तु स हतो राजा भीमसेनेन तच्छृणु ।)