महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1761, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः
जरासंधका भीमसेनके साथ युद्ध करनेका निश्चय, भीम और जरासंधका भयानक युद्ध तथा जरासंधकी थकावट
वैशम्पायन उवाच
ततस्तं निश्चितात्मानं युद्धाय यदुनन्दनः ।
उवाच वाग्मी राजानं जरासंधमधोक्षजः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा जरासंधने अपने मनमें युद्धका निश्चय कर लिया है, यह देख बोलनेमें कुशल यदुनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा ॥ १ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
त्रयाणां केन ते राजन् योद्धुमुत्सहते मनः ।
अस्मदन्यतमेनेह सज्जीभवतु को युधि ॥ २ ॥
श्रीकृष्णने पूछा—राजन्! हम तीनोंमेंसे किस एक व्यक्तिके साथ युद्ध करनेके लिये तुम्हारे मनमें उत्साह हो रहा है? हममेंसे कौन तुम्हारे साथ युद्धके लिये तैयार हो? ॥ २ ॥
एवमुक्तः स नृपतिर्युद्धं वव्रे महाद्युतिः ।
जरासंधस्ततो राजा भीमसेनेन मागधः ॥ ३ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी मगधनरेश राजा जरासंधने भीमसेनके साथ युद्ध करना स्वीकार किया ॥ ३ ॥
आदाय रोचनां माल्यं मङ्गल्यान्यपराणि च ।
धारयन्नगदान् मुख्यान् निर्वृतीर्वेदनानि च ।
उपतस्थे जरासंधं युयुत्सुं वै पुरोहितः ॥ ४ ॥
जरासंधको युद्ध करनेके लिये उत्सुक देख उसके पुरोहित गोरोचन, माला, अन्यान्य मांगलिक वस्तुएँ तथा उत्तम-उत्तम ओषधियाँ, जो पीड़ाके समय भी सुख देनेवाली और मूर्च्छाकालमें भी होश बनाये रखनेवाली थीं, लेकर उसके पास आये ॥ ४ ॥
कृतस्वस्त्ययनो राजा ब्राह्मणेन यशस्विना ।
समनह्यज्जरासंधः क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥ ५ ॥
यशस्वी ब्राह्मणके द्वारा स्वस्तिवाचन सम्पन्न हो जानेपर जरासंध क्षत्रियधर्मका स्मरण करके युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गया ॥ ५ ॥
अवमुच्य किरीटं स केशान् समनुगृह्य च ।
उदतिष्ठज्जरासंधो वेलातिग इवार्णवः ॥ ६ ॥