भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1773

नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दने । भीमार्जुनबलोपेते धर्मस्य प्रतिपालनम् ॥ ३२ ॥ ‘महाबाहो! आप देवकी देवीको आनन्दित करनेवाले साक्षात् भगवान् हैं, भीमसेन और अर्जुनका बल भी आपके साथ है। आपके द्वारा जो धर्मकी रक्षा हो रही है, वह आप-सरीखे धर्मावतारके लिये आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ३२ ॥

जरासंधह्रदे घोरे दुःखपङ्के निमज्जताम् । राज्ञां समभ्युद्धरणं यदिदं कृतमद्य वै ॥ ३३ ॥ ‘प्रभो! हम सब राजा दुःखरूपी पंकसे युक्त जरासंध-रूपी भयानक कुण्डमें डूब रहे थे, आपने जो आज हमारा यह उद्धार किया है, वह आपके योग्य ही है ॥ ३३ ॥

विष्णो समवसन्नानां गिरिदुर्गे सुदारुणे । दिष्ट्या मोक्षाद् यशो दीप्तमाप्तं ते यदुनन्दन ॥ ३४ ॥ ‘विष्णो! अत्यन्त भयंकर पहाड़ी किलेमें कैद हो हम बड़े दुःखसे दिन काट रहे थे। यदुनन्दन! आपने हमें इस संकटसे मुक्त करके अत्यन्त उज्ज्वल यश प्राप्त किया है; यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ३४ ॥

किं कुर्मः पुरुषव्याघ्र शाधि नः प्रणतिस्थितान् । कृतमित्येव तद् विद्धि नृपैर्यद्यपि दुष्करम् ॥ ३५ ॥ ‘पुरुषसिंह! हम आपके चरणोंमें पड़े हैं। आप हमें आज्ञा दीजिये, हम क्या सेवा करें? कोई दुष्कर कार्य हो तो भी आपको यह समझना चाहिये मानो हम सब राजाओंने मिलकर उसे पूर्ण कर ही दिया' ॥ ३५ ॥

तानुवाच हृषीकेशः समाश्वास्य महामनाः । युधिष्ठिरो राजसूयं क्रतुमाहर्तुमिच्छति ॥ ३६ ॥ तब महामना भगवान् हृषीकेशने उन सबको आश्वासन देकर कहा—‘राजाओ! धर्मराज युधिष्ठिर राजसूययज्ञ करना चाहते हैं ॥ ३६ ॥

तस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः । सर्वैर्भवद्भिर्विज्ञाय साहाय्यं क्रियतामिति ॥ ३७ ॥ ‘धर्ममें तत्पर रहते हुए ही उन्हें सम्राट् पद प्राप्त करनेकी इच्छा हुई है। इस कार्यमें तुम सब लोग उनकी सहायता करो' ॥ ३७ ॥

ततः सुप्रीतमनसस्ते नृपा नृपसत्तम । तथेत्येवाब्रुवन् सर्वे प्रतिगृह्यास्य तां गिरम् ॥ ३८ ॥ नृपश्रेष्ठ जनमेजय! तब उन सभी राजाओंने प्रसन्नचित्त हो 'तथास्तु' कहकर भगवान्‌की वह आज्ञा शिरोधार्य कर ली ॥ ३८ ॥

रत्नभाजं च दाशार्हं चक्रुस्ते पृथिवीश्वराः । कृच्छ्राज्जग्राह गोविन्दस्तेषां तदनुकम्पया ॥ ३९ ॥