भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1775

कालागुरुसुगन्धैश्च तैलैश्च विविधैरपि । घृतधाराक्षतैश्चैव सुमनोभिश्च मागधम् ।। समन्तादवकीर्यन्त दह्यन्तं मगधाधिपम् । उन सबने एक स्वरसे कहा—‘राजन्! तुम अपने पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करो।’ भगवान् श्रीकृष्ण तथा दोनों कुन्तीकुमारोंका यह आदेश सुनकर मगधराजकुमारने मन्त्रियोंके साथ शीघ्र ही नगरमें प्रवेश किया। फिर चन्दनकी लकड़ी तथा केसर, देवदारु और काला अगरु आदि सुगन्धित काष्ठोंसे चिता बनाकर उसपर मगधराजका शव रखा गया। तत्पश्चात् जलती चितामें दग्ध होते हुए मगधराजके शरीरपर नाना प्रकारके चन्दनादि सुगन्धित तैल और घीकी धाराएँ गिरायी गयीं। सब ओरसे अक्षत और फूलोंकी वर्षा की गयी।

उदकं तस्य चक्रेऽथ सहदेवः सहानुजः ।। कृत्वा पितुः स्वर्गगतिं निर्ययौ यत्र केशवः । पाण्डवौ च महाभागौ भीमसेनार्जुनोवुभौ ।। स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा विज्ञापयत माधवम् । शवदाहके पश्चात् सहदेवने अपने छोटे भाईके साथ पिताके लिये जलांजलि दी। इस प्रकार पिताका पारलौकिक कार्य करके राजकुमार सहदेव नगरसे निकलकर उस स्थानमें गया, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण तथा महाभाग पाण्डुपुत्र भीमसेन और अर्जुन विद्यमान थे। उसने नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा।

सहदेव उवाच

इमे रत्नानि भूरीणि गोऽजाविमहिषादयः । हस्तिनोऽश्वाश्च गोविन्द वासांसि विविधानि च ।। दीयतां धर्मराजाय यथा वा मन्यते भवान् ।) सहदेवने कहा—प्रभो! ये गाय, भैंस, भेड़-बकरे आदि पशु, बहुत-से रत्न, हाथी-घोड़े और नाना प्रकारके वस्त्र आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। गोविन्द! ये सब वस्तुएँ धर्मराज युधिष्ठिरको दीजिये अथवा आपकी जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझे सेवाके लिये आदेश दीजिये।

भयार्ताय ततस्तस्मै कृष्णो दत्त्वाभयं तदा । आददेऽस्य महार्हाणि रत्नानि पुरुषोत्तमः ।। ४२ ।। वह भयसे पीड़ित हो रहा था; पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने उसे अभयदान देकर उसके लाये हुए बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट स्वीकार कर ली ।। ४२ ।।

अभ्यषिञ्चत तत्रैव जरासंधात्मजं मुदा । गत्वैकत्वं च कृष्णेन पार्थाभ्यां चैव सत्कृतः ।। ४३ ।।

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