भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1778

पाण्डवैर्घातयामास जरासंधमरिं तदा ।। ५३ ।। जनमेजय! इस प्रकार महाबुद्धिमान् पुरुषसिंह जनार्दनने उस समय पाण्डवोंद्वारा अपने शत्रु जरासंधका वध करवाया ।। ५३ ।। घातयित्वा जरासंधं बुद्धिपूर्वमरिंदमः । धर्मराजमनुज्ञाप्य पृथां कृष्णां च भारत ।। ५४ ।। सुभद्रां भीमसेनं च फाल्गुनं यमौ तथा । धौम्यमामन्त्रयित्वा च प्रययौ स्वां पुरीं प्रति ।। ५५ ।। तेनैव रथमुख्येन मनसस्तुल्यगामिना । धर्मराजविसृष्टेन दिव्येनानादयन् दिशः ।। ५६ ।। भारत! जरासंधको बुद्धिपूर्वक मरवाकर शत्रुदमन श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर, कुन्ती तथा द्रौपदीसे आज्ञा ले, सुभद्रा, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा धौम्यजीसे भी पूछकर धर्मराजके दिये हुए उसी मनके समान वेगशाली दिव्य एवं उत्तम रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए अपनी द्वारकापुरीको चले गये ।। ५४-५६ ।। ततो युधिष्ठिरमुखाः पाण्डवा भरतर्षभ । प्रदक्षिणमकुर्वन्त कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ।। ५७ ।। भरतश्रेष्ठ! जाते समय युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंने अनायास ही सब कार्य करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी परिक्रमा की ।। ५७ ।। ततो गते भगवति कृष्णे देवकिनन्दने । जयं लब्ध्वा सुविपुलं राज्ञां दत्त्वाभयं तदा ।। ५८ ।। संवर्धितं यशो भूयः कर्मणा तेन भारत । द्रौपद्याः पाण्डवा राजन् परां प्रीतिमवर्धयन् ।। ५९ ।। भारत! महान् विजयको प्राप्त करके और जरासंधके द्वारा कैद किये हुए उन राजाओंको अभयदान देकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर उक्त कर्मके द्वारा पाण्डवोंके यशका बहुत विस्तार हुआ और वे पाण्डव द्रौपदीकी भी प्रीतिको बढ़ाने लगे ।। ५८-५९ ।। तस्मिन् काले तु यद् युक्तं धर्मकामार्थसंहितम् । तद् राजा धर्मतश्चक्रे प्रजापालनकीर्तनम् ।। ६० ।। उस समय धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये जो उचित कर्तव्य था, उसका राजा युधिष्ठिरने धर्मपूर्वक पालन किया। वे प्रजाओंकी रक्षा करनेके साथ ही उन्हें धर्मका उपदेश भी देते रहते थे ।। ६० ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधवधे चतुर्विंशोऽध्यायः ।। २४ ।।