महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1781, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह सुनकर भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही मन्त्रियों तथा व्यास, धौम्य आदि महर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ। तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् व्यासजीने अर्जुनसे कहा।
व्यास उवाच
साधु साध्विति कौन्तेय दिष्ट्या ते बुद्धिरीदृशी ।
पृथिवीमखिलां जेतुमेकोऽध्यवसितो भवान् ॥
व्यासजी बोले— कुन्तीनन्दन! मैं तुम्हें बारंबार साधुवाद देता हूँ। सौभाग्यसे तुम्हारी बुद्धिमें ऐसा संकल्प हुआ है। तुम सारी पृथ्वीको अकेले ही जीतनेके लिये उत्साहित हो रहे हो।
धन्यः पाण्डुर्महीपालो यस्य पुत्रस्त्वमीदृशः ।
सर्वं प्राप्स्यति राजेन्द्रो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
त्वद्वीर्येण स धर्मात्मा सार्वभौमत्वमेष्यति ।
राजा पाण्डु धन्य थे, जिनके पुत्र तुम ऐसे पराक्रमी निकले। तुम्हारे पराक्रमसे धर्मपुत्र धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर सब कुछ पा लेंगे। सार्वभौम सम्राट्के पदपर प्रतिष्ठित होंगे।
त्वद्बाहुबलमाश्रित्य राजसूयमवाप्स्यति ॥
सुनयाद् वासुदेवस्य भीमार्जुनबलेन च ।
यमयोश्चैव वीर्येण सर्वं प्राप्स्यति धर्मराट् ॥
तुम्हारे बाहुबलका सहारा पाकर ये राजसूययज्ञ पूर्ण कर लेंगे। भगवान् श्रीकृष्णकी उत्तम नीति, भीम और अर्जुनके बल तथा नकुल और सहदेवके पराक्रमसे धर्मराज युधिष्ठिरको सब कुछ प्राप्त हो जायगा।
तस्माद् दिशं देवगुप्तामुदीचीं गच्छ फाल्गुन ।
शक्तो भवान् सुराञ्जित्वा रत्नान्याहर्तुमोजसा ॥
इसलिये अर्जुन! तुम तो देवताओंद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशाकी यात्रा करो; क्योंकि देवताओंको जीतकर वहाँसे बलपूर्वक रत्न ले आनेमें तुम्हीं समर्थ हो।
प्राचीं भीमो बलश्लाघी प्रयातु भरतर्षभः ।
याम्यां तत्र दिशं यातु सहदेवो महारथः ॥
प्रतीचीं नकुलो गन्ता वरुणेनाभिपालिताम् ।
एषा मे नैष्ठिकी बुद्धिः क्रियतां भरतर्षभाः ॥
अपने बलद्वारा दूसरोंसे होड़ लेनेवाले भरतकुल-भूषण भीमसेन पूर्व दिशाकी यात्रा करें। महारथी सहदेव दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करें और नकुल वरुणपालित पश्चिम दिशापर आक्रमण करें। भरतश्रेष्ठ पाण्डवो! मेरी बुद्धिका ऐसा ही निश्चय है। तुमलोग इसका पालन करो।