भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1785

शाकलद्वीप तथा अन्य सातों द्वीपोंमें जो राजा रहते थे, उनके साथ अर्जुनके सैनिकोंका घमासान युद्ध हुआ ।। ६ ।। स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ । तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपादद्रवत् ।। ७ ।। भरतकुलभूषण जनमेजय! अर्जुनने उन महान् धनुर्धरोंको भी जीत लिया और उन सबको साथ लेकर प्राग्ज्योतिषपुरपर धावा किया ।। ७ ।। तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते । तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः ।। ८ ।। महाराज! प्राग्ज्योतिषपुरके प्रधान राजा भगदत्त थे। उनके साथ महात्मा अर्जुनका बड़ा भारी युद्ध हुआ ।। ८ ।। स किरातैश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिषोऽभवत् । अन्यैश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः ।। ९ ।। प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश किरात, चीन तथा समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले अन्य बहुतेरे योद्धाओंसे घिरे हुए थे ।। ९ ।। ततः स दिवसानष्टौ योधयित्वा धनंजयम् । प्रहसन्नब्रवीद् राजा संग्रामविगतक्लमम् ।। १० ।। राजा भगदत्तने अर्जुनके साथ आठ दिनोंतक युद्ध किया, तो भी उन्हें युद्धसे थकते न देख वे हँसते हुए बोले— ।। १० ।। उपपन्नं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन । पाकशासनदायादे वीर्यमाहवशोभिनि ।। ११ ।। ‘महाबाहु कौरवनन्दन! तुम इन्द्रके पुत्र और संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर हो। तुममें ऐसा बल और पराक्रम उचित ही है ।। ११ ।। अहं सखा महेन्द्रस्य शक्रादनवरो रणे । न शक्ष्यामि च ते तात स्थातुं प्रमुखतो युधि ।। १२ ।। ‘मैं देवराज इन्द्रका मित्र हूँ और युद्धमें उनसे तनिक भी कम नहीं हूँ, बेटा! तो भी मैं संग्राममें तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हो सकूँगा ।। १२ ।। त्वमीप्सितं पाण्डवेय ब्रूहि किं करवाणि ते । यद् वक्ष्यसि महाबाहो तत् करिष्यामि पुत्रक ।। १३ ।। ‘पाण्डुनन्दन! तुम्हारी इच्छा क्या है, बताओ? मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? वत्स! महाबाहो! तुम जो कहोगे, वही करूँगा' ।। १३ ।।

अर्जुन उवाच

कुरूणामृषभो राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।