भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1788

तब राजा बृहन्त तुरंत ही चतुरंगिणी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले और अर्जुनसे युद्ध करने लगे ॥ ७ ॥ सुमहान् संनिपातोऽभूद् धनंजयबृहन्तयोः । न शशाक बृहन्तस्तु सोढुं पाण्डवविक्रमम् ॥ ८ ॥ उस समय अर्जुन और बृहन्तमें बड़े जोरकी मार-काट शुरू हुई, परंतु बृहन्त पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको न सह सके ॥ ८ ॥ सोऽविषह्यतमं मत्वा कौन्तेयं पर्वतेश्वरः । उपावर्तत दुर्धर्षो रत्नान्यादाय सर्वशः ॥ ९ ॥ कुन्तीकुमारको असह्य मानकर दुर्धर्ष वीर पर्वतराज बृहन्त युद्धसे हट गये और सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ९ ॥ स तद्राज्यमवस्थाप्य उलूकसहितो ययौ । सेनाबिन्दुमथो राजन् राज्यादाशु समाक्षिपत् ॥ १० ॥ जनमेजय! अर्जुनने बृहन्तका राज्य पुनः उन्हींके हाथमें सौंपकर उलूकराजके साथ सेनाबिन्दुपर आक्रमण किया और उन्हें शीघ्र ही राज्यच्युत कर दिया ॥ १० ॥ मोदापुरं वामदेवं सुदामानं सुसंकुलम् । उलूकानुत्तरांश्चैव तांश्च राज्ञः समानयत् ॥ ११ ॥ तदनन्तर मोदापुर, वामदेव, सुदामा, सुसंकुल तथा उत्तर उलूक देशों और वहाँके राजाओंको अपने अधीन किया ॥ ११ ॥ तत्रस्थः पुरुषैरेव धर्मराजस्य शासनात् । किरीटी जितवान् राजन् देशान् पञ्चगणांस्ततः ॥ १२ ॥ राजन्! धर्मराजकी आज्ञासे किरीटधारी अर्जुनने वहीं रहकर अपने सेवकोंद्वारा पंचगण नामक देशोंको जीत लिया ॥ १२ ॥ स देवप्रस्थमासाद्य सेनाबिन्दोः पुरं प्रति । बलेन चतुरङ्गेण निवेशमकरोत् प्रभुः ॥ १३ ॥ वहाँसे सेनाबिन्दु की राजधानी देवप्रस्थमें आकर चतुरंगिणी सेनाके साथ शक्तिशाली अर्जुनने वहीं पड़ाव डाला ॥ १३ ॥ स तैः परिवृतः सर्वैर्विश्वगश्वं नराधिपम् । अभ्यगच्छन्महातेजाः पौरवं पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥ नरश्रेष्ठ! उन सभी पराजित राजाओंसे घिरे हुए महातेजस्वी अर्जुनने पौरव राजा विश्वगश्वपर आक्रमण किया ॥ १४ ॥ विजित्य चाहवे शूरान् पर्वतीयान् महारथान् । जिगाय सेनया राजन् पुरं पौरवरक्षितम् ॥ १५ ॥