महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्निहोत्रेषु सत्रेषु क्रियासु च मखेषु च ॥ ६ ॥ ‘मैं योगसिद्धिके बलसे अपने-आपको अनेक रूपोंमें प्रकट करके गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि आदि मूर्तियोंमें, नित्य किये जानेवाले अग्निहोत्रोंमें, अनेक व्यक्तियोंद्वारा संचालित सत्रोंमें, गर्भाधान आदि क्रियाओंमें तथा ज्योतिष्टोम आदि मखों (यज्ञों)-में सदा निवास करता हूँ॥ ६ ॥
वेदोक्तेन विधानेन मयि यद् हूयते हविः । देवताः पितरश्चैव तेन तृप्ता भवन्ति वै ॥ ७ ॥ ‘मुझमें वेदोक्त विधिसे जिस हविष्यकी आहुति दी जाती है, उसके द्वारा निश्चय ही देवता तथा पितृगण तृप्त होते हैं॥ ७ ॥
आपो देवगणाः सर्वे आपः पितृगणास्तथा । दर्शश्च पूर्णमासश्च देवानां पितृभिः सह ॥ ८ ॥ ‘जल ही देवता हैं तथा जल ही पितृगण हैं। दर्श और पौर्णमास याग पितरों तथा देवताओंके लिये किये जाते हैं॥ ८ ॥
देवताः पितरस्तस्मात् पितरश्चापि देवताः । एकीभूताश्च पूज्यन्ते पृथक्त्वेन च पर्वसु ॥ ९ ॥ ‘अतः देवता पितर हैं और पितर ही देवता हैं। विभिन्न पर्वोंपर ये दोनों एक रूपमें भी पूजे जाते हैं और पृथक्-पृथक् भी॥ ९ ॥
देवताः पितरश्चैव भुञ्जते मयि यद् हुतम् । देवतानां पितॄणां च मुखमेतदहं स्मृतम् ॥ १० ॥ ‘मुझमें जो आहुति दी जाती है, उसे देवता और पितर दोनों भक्षण करते हैं। इसीलिये मैं देवताओं और पितरोंका मुख माना जाता हूँ॥ १० ॥
अमावास्यां हि पितरः पौर्णमास्यां हि देवताः । मन्मुखेनैव हूयन्ते भुञ्जते च हुतं हविः ॥ ११ ॥ सर्वभक्षः कथं त्वेषां भविष्यामि मुखं त्वहम् । ‘अमावास्याको पितरोंके लिये और पूर्णिमाको देवताओंके लिये मेरे मुखसे ही आहुति दी जाती है और उस आहुतिके रूपमें प्राप्त हुए हविष्यका वे देवता और पितर उपभोग करते हैं, सर्वभक्षी होनेपर मैं इन सबका मुँह कैसे हो सकता हूँ?’ ॥ ११ १/२ ॥
सौतिरुवाच
चिन्तयित्वा ततो वह्निश्चक्रे संहारमात्मनः ॥ १२ ॥ द्विजानामग्निहोत्रेषु यज्ञसत्रक्रियासु च । निरोंकारवषट्काराः स्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥ १३ ॥ विनाग्निना प्रजाः सर्वास्तत आसन् सुदुःखिताः ।