भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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क्रियाओंके प्रवर्तक भी तुम्हीं हो। अतः लोकेश्वर! तुम ऐसा करो जिससे अग्निहोत्र आदि क्रियाओंका लोप न हो। तुम सबके स्वामी होकर भी इस प्रकार मूढ़ (मोहग्रस्त) कैसे हो गये? तुम संसारमें सदा पवित्र हो, समस्त प्राणियोंकी गति भी तुम्हीं हो ।। १८—२१ ।। न त्वं सर्वशरीरेण सर्वभक्षत्वमेष्यसि । अपाने ह्यर्चिषो यास्ते सर्वं भक्ष्यन्ति ताः शिखिन् ।। २२ ।। 'तुम सारे शरीरसे सर्वभक्षी नहीं होओगे। अग्निदेव! तुम्हारे अपानदेशमें जो ज्वालाएँ होंगी, वे ही सब कुछ भक्षण करेंगी ।। २२ ।। क्रव्यादा च तनुर्या ते सा सर्वं भक्षयिष्यति । यथा सूर्यांशुभिः स्पृष्टं सर्वं शुचि विभाव्यते ।। २३ ।। तथा त्वदर्चिर्निर्दग्धं सर्वं शुचि भविष्यति । त्वमग्ने परमं तेजः स्वप्रभावाद् विनिर्गतम् ।। २४ ।। स्वतेजसैव तं शापं कुरु सत्यमृषेर्विभो । देवानां चात्मनो भागं गृहाण त्वं मुखे हुतम् ।। २५ ।। 'इसके सिवा जो तुम्हारी क्रव्याद मूर्ति है (कच्चा मांस या मुर्दा जलानेवाली जो चिताकी आग है) वही सब कुछ भक्षण करेगी। जैसे सूर्यकी किरणोंसे स्पर्श होनेपर सब वस्तुएँ शुद्ध मानी जाती हैं, उसी प्रकार तुम्हारी ज्वालाओंसे दग्ध होनेपर सब कुछ शुद्ध हो जायगा। अग्निदेव! तुम अपने प्रभावसे ही प्रकट हुए उत्कृष्ट तेज हो; अतः विभो! अपने तेजसे ही महर्षिके उस शापको सत्य कर दिखाओ और अपने मुखमें आहुतिके रूपमें पड़े हुए देवताओंके तथा अपने भागको भी ग्रहण करो' ।। २३—२५ ।।

सौतिरुवाच एवमस्त्विति तं वह्निः प्रत्युवाच पितामहम् । जगाम शासनं कर्तुं देवस्य परमेष्ठिनः ।। २६ ।। **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**यह सुनकर अग्निदेवने पितामह ब्रह्माजीसे कहा—'एवमस्तु (ऐसा ही हो)।' यों कहकर वे भगवान् ब्रह्माजीके आदेशका पालन करनेके लिये चल दिये ।। २६ ।। देवर्षयश्च मुदितास्ततो जग्मुर्यथागतम् । ऋषयश्च यथापूर्वं क्रियाः सर्वाः प्रचक्रिरे ।। २७ ।। इसके बाद देवर्षिगण अत्यन्त प्रसन्न हो जैसे आये थे वैसे ही चले गये। फिर ऋषि-महर्षि भी अग्निहोत्र आदि सम्पूर्ण कर्मोंका पूर्ववत् पालन करने लगे ।। २७ ।। दिवि देवा मुमुदिरे भूतसङ्घाश्च लौकिकाः । अग्निश्च परमां प्रीतिमवाप हतकल्मषः ।। २८ ।।