महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1812, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर पुलिन्दोंको संग्राममें हराकर नकुलके छोटे भाई सहदेव दक्षिण दिशामें और आगे बढ़ गये। तत्पश्चात् उन्होंने पाण्ड्य-नरेशके साथ एक दिन युद्ध किया ॥ १६ ॥ तं जित्वा स महाबाहुः प्रययौ दक्षिणापथम् । गुहामासादयामास किष्किन्धां लोकविश्रुताम् ॥ १७ ॥ उन्हें जीतकर महाबाहु सहदेव दक्षिणापथकी ओर गये और लोकविख्यात किष्किन्धा नामक गुफामें जा पहुँचे ॥ १७ ॥ तत्र वानरराजाभ्यां मैन्देन द्विविदेन च । युयुधे दिवसान् सप्त न च तौ विकृतिं गतौ ॥ १८ ॥ वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविदके साथ उन्होंने सात दिनोंतक युद्ध किया; किंतु उन दोनोंका कुछ बिगाड़ न हो सका ॥ १८ ॥ ततस्तुष्टौ महात्मानौ सहदेवाय वानरौ । ऊचतुश्चैव संहृष्टौ प्रीतिपूर्वमिदं वचः ॥ १९ ॥ तब वे दोनों महात्मा वानर अत्यन्त प्रसन्न हो सहदेवसे प्रेमपूर्वक बोले— ॥ १९ ॥ गच्छ पाण्डवशार्दूल रत्नान्यादाय सर्वशः । अविघ्नमस्तु कार्याय धर्मराजाय धीमते ॥ २० ॥ ‘पाण्डवप्रवर! तुम सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान् धर्मराजके कार्यमें कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिये' ॥ २० ॥ ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ । तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः ॥ २१ ॥ तदनन्तर वे नरश्रेष्ठ वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर माहिष्मतीपुरीको गये और वहाँ राजा नीलके* साथ घोर युद्ध किया ॥ २१ ॥ पाण्डवः परवीरघ्नः सहदेवः प्रतापवान् । ततोऽस्य सुमहद् युद्धमासीद् भीरुभयंकरम् ॥ २२ ॥ सैन्यक्षयकरं चैव प्राणानां संशयावहम् । चक्रे तस्य हि साहाय्यं भगवान् हव्यवाहनः ॥ २३ ॥ शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुपुत्र सहदेव बड़े प्रतापी थे। उनसे राजा नीलका जो महान् युद्ध हुआ, वह कायरोंको भयभीत करनेवाला, सेनाओंका विनाशक और प्राणोंको संशयमें डालनेवाला था। भगवान् अग्निदेव राजा नीलकी सहायता कर रहे थे ॥ २२-२३ ॥ ततो रथा हया नागाः पुरुषाः कवचानि च । प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेवबले तदा ॥ २४ ॥ उस समय सहदेवकी सेनामें रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य और कवच सभी आगसे जलते दिखायी देने लगे ॥ २४ ॥ ततः सुसम्भ्रान्तमना बभूव कुरुनन्दनः ।