महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिताः ॥ वे सभी युद्धमें कुशल हैं और नाना प्रकारके वेष धारण करते हैं। घटोत्कचने वहाँकी नारियोंको भी देखा। वे सब-की-सब बड़ी सुन्दर थीं। उनके अंगोंमें दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य हार शोभा दे रहे थे।
मदरक्तान्तनयनाः पीनश्रोणिपयोधराः । भैमसेनिं ततो दृष्ट्वा हृष्टास्ते विस्मयं गताः ॥ उनके नेत्रोंके किनारे मदिराके नशेसे कुछ लाल हो रहे थे। उनके नितम्ब और उरोज उभरे हुए तथा मांसल थे। भीमसेनपुत्र घटोत्कचको वहाँ आया देख लंकानिवासी राक्षसोंको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ।
आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम् । स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ इधर घटोत्कच इन्द्रभवनके समान मनोहर राजमहलके द्वारपर जा पहुँचा और द्वारपालसे इस प्रकार बोला।
घटोत्कच उवाच
कुरूणामृषभो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः । कनीयांस्तस्य दायादः सहदेव इति श्रुतः ॥ **घटोत्कचने कहा—**कुरुकुलमें एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। वे महाबली नरेश 'पाण्डु' के नामसे विख्यात थे। उनके सबसे छोटे पुत्रका नाम 'सहदेव' है।
कृष्णमित्रस्य तु गुरो राजसूयार्थमुद्यतः । तेनाहं प्रेषितो दूतः करार्थं कौरवस्य च ॥ वे अपने बड़े भाई युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ सम्पन्न करनेके लिये कटिबद्ध हैं। धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं। सहदेवने कुरुराज युधिष्ठिरके लिये कर लेनेके निमित्त मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है।
द्रष्टुमिच्छामि पौलस्त्यं त्वं क्षिप्रं मां निवेदय । मैं पुलस्त्यनन्दन महाराज विभीषणसे मिलना चाहता हूँ। तुम शीघ्र जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दो।
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा द्वारपालो महीपते । तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदकः ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! घटोत्कचका वह वचन सुनकर वह द्वारपाल 'बहुत अच्छा' कहकर सूचना देनेके लिये राजभवनके भीतर गया।
साञ्जलिः स समाचष्ट सर्वां दूतगिरं तदा ।