महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1826, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम् । धर्मे चैव स्थितं नित्यमद्भुतं राक्षसेश्वरम् ॥ राक्षसराज विभीषण कुबेर और वरुणके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं अद्भुत दिखायी देते थे। उनके अंगोंसे दिव्य प्रभा छिटक रही थी। वे सदा धर्ममें स्थित रहते थे। राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा । दृष्ट्वा घटोत्कचो राजन् ववन्दे तं कृताञ्जलिः ॥ वे मन-ही-मन इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते थे। राजन्! उन राक्षसराज विभीषणको देख घटोत्कचने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। प्रह्वस्तस्थौ महावीर्यः शक्रं चित्ररथो यथा । तं दूतमागतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् । और जैसे महापराक्रमी चित्ररथ इन्द्रके सामने नम्र रहते हैं, उसी प्रकार महाबली घटोत्कच भी विनीतभावसे उनके सम्मुख खड़ा हो गया। राक्षसराज विभीषणने उस दूतको आया हुआ देख उसका यथायोग्य सम्मान करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंमें कहा।
विभीषण उवाच
कस्य वंशे तु संजातः करमिच्छन् महीपतिः ॥ तस्यानुजान् समस्तांश्च पुरं देशं च तस्य वै । त्वां च कार्यं च तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ विस्तरेण मम ब्रूहि सर्वानैतान् पृथक्-पृथक् । विभीषणने पूछा— दूत! जो महाराज मुझसे कर लेना चाहते हैं, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए हैं। उनके समस्त भाइयों तथा ग्राम और देशका परिचय दो। मैं तुम्हारे विषयमें भी जानना चाहता हूँ तथा तुम जिस कार्यके लिये कर लेने आये हो, उस समस्त कार्यके विषयमें भी मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। तुम मेरी पूछी हुई इन सब बातोंको विस्तारपूर्वक पृथक्-पृथक् बताओ।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु हैडिम्बः पौलस्त्येन महात्मना ॥ कृताञ्जलिरुवाचाथ सान्त्वयन् राक्षसाधिपम् । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महात्मा विभीषणके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने हाथ जोड़कर राक्षसराजको आश्वासन देते हुए कहा।
घटोत्कच उवाच
सोमस्य वंशे राजाऽऽसीत् पाण्डुर्नाम महाबलः ।