भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

अप्सरा मेनका तस्य तं गर्भं भृगुनन्दन । उत्ससर्ज यथाकालं स्थूलकेशाश्रमं प्रति ।। ७ ।। भृगुनन्दन! मेनका अप्सराने गन्धर्वराजद्वारा स्थापित किये हुए उस गर्भको समय पूरा होनेपर स्थूलकेश मुनिके आश्रमके निकट जन्म दिया ।। ७ ।। उत्सृज्य चैव तं गर्भं नद्यास्तीरे जगाम सा । अप्सरा मेनका ब्रह्मन् निर्दया निरपत्रपा ।। ८ ।। ब्रह्मन्! निर्दय और निर्लज्ज मेनका अप्सरा उस नवजात गर्भको वहीं नदीके तटपर छोड़कर चली गयी ।। ८ ।। कन्याममरगर्भाभां ज्वलन्तीमिव च श्रिया । तां ददर्श समुत्सृष्टां नदीतीरे महानृषिः ।। ९ ।। स्थूलकेशः स तेजस्वी विजने बन्धुवर्जिताम् । स तां दृष्ट्वा तदा कन्यां स्थूलकेशो महाद्विजः ।। १० ।। जग्राह च मुनिश्रेष्ठः कृपाविष्टः पुपोष च । ववृधे सा वरारोहा तस्याश्रमपदे शुभे ।। ११ ।। तदनन्तर तेजस्वी महर्षि स्थूलकेशने एकान्त स्थानमें त्यागी हुई उस बन्धुहीन कन्याको देखा, जो देवताओंकी बालिकाके समान दिव्य शोभासे प्रकाशित हो रही थी। उस समय उस कन्याको वैसी दशामें देखकर द्विजश्रेष्ठ मुनिवर स्थूलकेशके मनमें बड़ी दया आयी; अतः वे उसे उठा लाये और उसका पालन-पोषण करने लगे। वह सुन्दरी कन्या उनके शुभ आश्रमपर दिनोदिन बढ़ने लगी ।। ९—११ ।। जातकाद्याः क्रियाश्चास्या विधिपूर्वं यथाक्रमम् । स्थूलकेशो महाभागश्चकार सुमहर्षिः ।। १२ ।। महाभाग महर्षि स्थूलकेशने क्रमशः उस बालिकाके जात-कर्मादि सब संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये ।। १२ ।। प्रमदाभ्यो वरा सा तु सत्त्वरूपगुणान्विता । ततः प्रमद्वरेत्यस्या नाम चक्रे महानृषिः ।। १३ ।। वह बुद्धि, रूप और सब उत्तम गुणोंसे सुशोभित हो संसारकी समस्त प्रमदाओं (सुन्दरी स्त्रियों)-से श्रेष्ठ जान पड़ती थी; इसलिये महर्षिने उसका नाम 'प्रमद्वरा' रख दिया ।। १३ ।। तामाश्रमपदे तस्य रुरुर्दृष्ट्वा प्रमद्वराम् । बभूव किल धर्मात्मा मदनोपहतस्तदा ।। १४ ।। एक दिन धर्मात्मा रुरुने महर्षिके आश्रममें उस प्रमद्वराको देखा। उसे देखते ही उनका हृदय तत्काल कामदेवके वशीभूत हो गया ।। १४ ।। पितरं सखिभिः सोऽथ श्रावयामास भार्गवम् । प्रमतिश्चाभ्ययाचत् तां स्थूलकेशं यशस्विनम् ।। १५ ।।