महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1843, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथोपकरणं सर्वं मङ्गलानि च सर्वशः ॥ २८ ॥ अधियज्ञांश्च सम्भारान् धौम्योक्तान् क्षिप्रमेव हि । समानयन्तु पुरुषा यथायोगं यथाक्रमम् ॥ २९ ॥ 'इस यज्ञके लिये ब्राह्मणोंके बताये अनुसार यज्ञके अंगभूत सामान, आवश्यक उपकरण, सब प्रकारकी मांगलिक वस्तुएँ तथा धौम्यजीकी बतायी हुई यज्ञोपयोगी सामग्री—इन सभी वस्तुओंको क्रमशः जैसे मिलें, वैसे शीघ्र ही अपने सेवक जाकर ले आवें ॥ २८-२९ ॥
इन्द्रसेनो विशोकश्च पूरुश्चार्जुनसारथिः । अन्नाद्याहरणे युक्ताः सन्तु मत्प्रियकाम्यया ॥ ३० ॥ 'इन्द्रसेन, विशोक और अर्जुनका सारथि पूरु, ये मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे अन्न आदिके संग्रहके कामपर जुट जायँ ॥ ३० ॥
सर्वकामाश्च कार्यन्तां रसगन्धसमन्विताः । मनोरथप्रीतिकरा द्विजानां कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥ 'कुरुश्रेष्ठ! जिनको खानेकी प्रायः सभी इच्छा करते हैं, वे रस और गन्धसे युक्त भाँति-भाँतिके मिष्टान्न आदि तैयार कराये जाँय, जो ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार प्रीति प्रदान करनेवाले हों' ॥ ३१ ॥
तद्वाक्यसमकालं च कृतं सर्वं न्यवेदयत् । सहदेवो युधां श्रेष्ठो धर्मराजे युधिष्ठिरे ॥ ३२ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात समाप्त होते ही योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने उनसे निवेदन किया, 'यह सब व्यवस्था हो चुकी है' ॥ ३२ ॥
ततो द्वैपायनो राजन्नृत्विजः समुपानयत् । वेदानिव महाभागान् साक्षान्मूर्तिमतो द्विजान् ॥ ३३ ॥ राजन्! तदनन्तर द्वैपायन व्यासजी बहुत-से ऋत्विजोंको ले आये। वे महाभाग ब्राह्मण मानो साक्षात् मूर्तिमान् वेद ही थे ॥ ३३ ॥
स्वयं ब्रह्मत्वमकरोत् तस्य सत्यवतीसुतः । धनंजयानामृषभः सुसामा सामगोऽभवत् ॥ ३४ ॥ स्वयं सत्यवतीनन्दन व्यासने उस यज्ञमें ब्रह्माका काम सँभाला। धनंजयगोत्रीय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ सुसामा सामगान करनेवाले हुए ॥ ३४ ॥
याज्ञवल्क्यो बभूवाथ ब्रह्मिष्ठोऽध्वर्युसत्तमः । पैलो होता वसोः पुत्रो धौम्येन सहितोऽभवत् ॥ ३५ ॥ और ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवल्क्य उस यज्ञके श्रेष्ठतम अध्वर्यु थे। वसुपुत्र पैल धौम्य मुनिके साथ होता बने थे ॥ ३५ ॥
एतेषां पुत्रवर्गाश्च शिष्याश्च भरतर्षभ ।