भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1845

ततस्ते तु यथाकालं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । दीक्षयाञ्चक्रिरे विप्रा राजसूयाय भारत ॥ ४३ ॥ भारत! तदनन्तर वहाँ आये हुए सब ब्राह्मणोंने ठीक समयपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राजसूययज्ञकी दीक्षा दी ॥ ४३ ॥

दीक्षितः स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः । जगाम यज्ञायतनं वृतो विप्रैः सहस्रशः ॥ ४४ ॥ यज्ञकी दीक्षा लेकर धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सहस्रों ब्राह्मणोंसे घिरे हुए यज्ञमण्डपमें गये ॥ ४४ ॥

भ्रातृभिर्ज्ञातिभिश्चैव सुहृद्भिः सचिवैः सह । क्षत्रियैश्च मनुष्येन्द्रैर्नानादेशसमागतैः ॥ ४५ ॥ अमात्यैश्च नरश्रेष्ठो धर्मो विग्रहवानिव । उस समय उनके सगे भाई, जाति-बन्धु, सुहृद्, सहायक अनेक देशोंसे आये हुए क्षत्रिय-नरेश तथा मन्त्रिगण भी थे। नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर मूर्तिमान् धर्म ही जान पड़ते थे ॥ ४५ १/२ ॥

आजग्मुर्ब्राह्मणास्तत्र विषयेभ्यस्ततस्ततः ॥ ४६ ॥ सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदाङ्गपारगाः । तत्पश्चात् वहाँ भिन्न-भिन्न देशोंसे ब्राह्मणलोग आये, जो सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्णात तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे ॥ ४६ १/२ ॥

तेषामावसथांश्चक्रुर्धर्मराजस्य शासनात् ॥ ४७ ॥ बह्वन्नाच्छादनैर्युक्तान् सगणानां पृथक् पृथक् । सर्वर्तुगुणसम्पन्नान् शिल्पिनोऽथ सहस्रशः ॥ ४८ ॥ धर्मराजकी आज्ञासे हजारों शिल्पियोंने आत्मीयजनोंके साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंके ठहरनेके लिये पृथक्-पृथक् घर बनाये थे, जो बहुत-से अन्न और वस्त्रोंसे परिपूर्ण थे और जिनमें सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक रहनेकी सुविधाएँ थीं ॥ ४७-४८ ॥

तेषु ते न्यवसन् राजन् ब्राह्मणा नृपसत्कृताः । कथयन्तः कथा बह्वीः पश्यन्तो नटनर्तकान् ॥ ४९ ॥ राजन्! उन गृहोंमें वे ब्राह्मणलोग राजासे सत्कार पाकर निवास करने लगे। वहाँ वे नाना प्रकारकी कथाएँ कहते और नट-नर्तकोंके खेल देखते थे ॥ ४९ ॥

भुज्यतां चैव विप्राणां वदतां च महास्वनः । अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम् ॥ ५० ॥ वहाँ भोजन करते और बोलते हुए आनन्दमग्न महात्मा ब्राह्मणोंका निरन्तर महान् कोलाहल सुनायी पड़ता था ॥ ५० ॥

दीयतां दीयतामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति ।