भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1849

ददुस्तेषामावसथान् धर्मराजस्य शासनात् ॥ १८ ॥ बहुभक्ष्यान्वितान् राजन् दीर्घिकावृक्षशोभितान् । तथा धर्मात्मजः पूजां चक्रे तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥ धर्मराजकी आज्ञासे प्रबन्धकोंने उनके ठहरनेके लिये उत्तम भवन दिये, जो बहुत अधिक भोजनसामग्रीसे सम्पन्न थे। राजन्! उन घरोंके भीतर स्नानके लिये बावलियाँ बनी थीं और वे भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे भी सुशोभित थे। धर्मपुत्र युधिष्ठिर उन सभी महात्मा नरेशोंका स्वागत-सत्कार करते थे ॥ १८-१९ ॥

सत्कृताश्च यथोद्दिष्टाञ्जग्मुरावसथान् नृपाः । कैलासशिखरप्रख्यान् मनोज्ञान् द्रव्यभूषितान् ॥ २० ॥ उनसे सम्मानित हो उन्हींके बताये हुए विभिन्न भवनोंमें जाकर राजालोग ठहरते थे। वे सभी भवन कैलासशिखरके समान ऊँचे और भव्य थे। नाना प्रकारके द्रव्योंसे विभूषित एवं मनोहर थे ॥ २० ॥

सर्वतः संवृतानुच्चैः प्राकारैः सुकृतैः सितैः । सुवर्णजालसंवीतान् मणिकुट्टिमभूषितान् ॥ २१ ॥ वे भव्य भवन सब ओरसे सुन्दर, सफेद और ऊँचे परकोटोंद्वारा घिरे हुए थे। उनमें सोनेकी झालरें लगी थीं। उनके आँगनके फर्शमें मणि एवं रत्न जड़े हुए थे ॥ २१ ॥

सुखारोहणसोपानान् महासनपरिच्छदान् । स्रग्दामसमवच्छन्नानुत्तमागुरुगन्धिनः ॥ २२ ॥ उनमें सुखपूर्वक ऊपर चढ़नेके लिये सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। उन महलोंके भीतर बहुमूल्य एवं बड़े-बड़े आसन तथा अन्य आवश्यक सामान थे। उन घरोंको मालाओंसे सजाया गया था। उनमें उत्तम अगुरुकी सुगन्ध व्याप्त हो रही थी ॥ २२ ॥

हंसेन्दुवर्णसदृशानायोजनसुदर्शनान् । असम्बाधान् समद्वारान् युतानुच्चावचैर्गुणैः ॥ २३ ॥ वे सभी अतिथिभवन हंस और चन्द्रमाके समान सफेद थे। एक योजन दूरसे ही वे अच्छी तरह दिखायी देने लगते थे। उनमें स्थानकी संकीर्णता या तंगी नहीं थी। सबके दरवाजे बराबर थे। वे सभी गृह विभिन्न गुणों (सुख-सुविधाओं)-से युक्त थे ॥ २३ ॥

बहुधातुनिबद्धाङ्गान् हिमवच्छिखरानिव । उनकी दीवारें अनेक प्रकारकी धातुओंसे चित्रित थीं तथा वे हिमालयके शिखरोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे ॥ २३ ½ ॥

विश्रान्तास्ते ततोऽपश्यन् भूमिपा भूरिदक्षिणम् ॥ २४ ॥ वृतं सदस्यैर्बहुभिर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् । तत् सदः पार्थिवै कीर्णं ब्राह्मणैश्च महर्षिभि । भ्राजते स्म तदा राजन् नाकपृष्ठं यथामरैः ॥ २५ ॥