महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मज्ञ नारदजीने इसी पुरातन वृत्तान्तका स्मरण किया और ये भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त यज्ञोंके द्वारा आराधनीय, सर्वेश्वर नारायण हैं; ऐसा समझकर वे धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् देवर्षि मेधावी धर्मराजके उस महायज्ञमें बड़े आदरके साथ बैठे रहे॥ २०-२१॥ ततो भीष्मोऽब्रवीद् राजन् धर्मराजं युधिष्ठिरम्। क्रियतामर्हणं राज्ञां यथार्हमिति भारत॥ २२॥ जनमेजय! तत्पश्चात् भीष्मजीने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—'भरतकुलभूषण युधिष्ठिर! अब तुम यहाँ पधारे हुए राजाओंका यथायोग्य सत्कार करो'॥ २२॥ आचार्यमृत्विजं चैव संयुजं च युधिष्ठिर। स्नातकं च प्रियं प्राहुः षडर्घ्यार्हान् नृपं तथा॥ २३॥ आचार्य, ऋत्विज्, सम्बन्धी, स्नातक, प्रिय मित्र तथा राजा—इन छहोंको अर्घ्य देकर पूजनेयोग्य बताया गया है॥ २३॥ एतानर्घ्यानभिगतानाहुः संवत्सरोषितान्। त इमे कालपूगस्य महतोऽस्मानुपागताः॥ २४॥ 'ये यदि एक वर्ष बिताकर अपने यहाँ आवें तो इनके लिये अर्घ्य निवेदन करके इनकी पूजा करनी चाहिये, ऐसा शास्त्रज्ञ पुरुषोंका कथन है। ये सभी नरेश हमारे यहाँ सुदीर्घकालके पश्चात् पधारे हैं॥ २४॥ एषामेकैकशो राजन्नर्घ्यमानीयतामिति। अथ चैषां वरिष्ठाय समर्थायोपनीयताम्॥ २५॥ इसलिये राजन्! तुम बारी-बारीसे इन सबके लिये अर्घ्य दो और इन सबमें जो श्रेष्ठ एवं शक्तिशाली हो, उसको सबसे पहले अर्घ्य समर्पित करो'॥ २५॥
युधिष्ठिर उवाच कस्मै भवान् मन्यतेऽर्घ्यमेकस्मै कुरुनन्दन। उपनीयमानं युक्तं च तन्मे ब्रूहि पितामह॥ २६॥ युधिष्ठिरने पूछा— कुरुनन्दन पितामह! इन समागत नरेशोंमें किस एकको सबसे पहले अर्घ्य निवेदन करना आप उचित समझते हैं? यह मुझे बताइये॥ २६॥
वैशम्पायन उवाच ततो भीष्मः शान्तनवो बुद्ध्या निश्चित्य वीर्यवान्। अमन्यत तदा कृष्णमर्हणीयतमं भुवि॥ २७॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— तब महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी बुद्धिसे निश्चय करके भगवान् श्रीकृष्णको ही भूमण्डलमें सबसे अधिक पूजनीय माना॥ २७॥
भीष्म उवाच