महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1871, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरें ।। २१ ।। ऋत्विग् गुरुस्तथाऽऽचार्यः स्नातको नृपतिः प्रियः । सर्वमेतद्धृषीकेशस्तस्मादभ्यर्चितोऽच्युतः ।। २२ ।। श्रीकृष्ण हमारे ऋत्विक्, गुरु, आचार्य, स्नातक, राजा और प्रिय मित्र सब कुछ हैं। इसीलिये हमने इनकी अग्रपूजा की है ।। २२ ।। कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः । कृष्णस्य हि कृते विश्वमिदं भूतं चराचरम् ।। २३ ।। भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। यह सारा चराचर विश्व इन्हींके लिये प्रकट हुआ है ।। २३ ।। एष प्रकृतिरव्यक्ता कर्ता चैव सनातनः । परश्च सर्वभूतेभ्यस्तस्मात् पूज्यतमोऽच्युतः ।। २४ ।। ये ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता तथा सम्पूर्ण भूतोंसे परे हैं; अतः भगवान् अच्युत ही सबसे बढ़कर पूजनीय हैं ।। २४ ।। बुद्धिर्मनो महद् वायुस्तेजोऽम्भः खं मही च या । चतुर्विधं च यद् भूतं सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ।। २५ ।। महत्तत्त्व, अहंकार, मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके प्राणी भगवान् श्रीकृष्णमें ही प्रतिष्ठित हैं ।। २५ ।। आदित्यश्चन्द्रमाश्चैव नक्षत्राणि ग्रहाश्च ये । दिशश्च विदिशश्चैव सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ।। २६ ।। अग्निहोत्रमुखा वेदा गायत्री छन्दसां मुखम् । राजा मुखं मनुष्याणां नदीनां सागरो मुखम् ।। २७ ।। नक्षत्राणां मुखं चन्द्र आदित्यस्तेजसां मुखम् । पर्वतानां मुखं मेरुर्गरुडः पततां मुखम् ।। २८ ।। ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव यावती जगतो गतिः । सदेवकेषु लोकेषु भगवान् केशवो मुखम् ।। २९ ।। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा सब उन्हींमें स्थित हैं। जैसे वेदोंमें अग्निहोत्रकर्म, छन्दोंमें गायत्री, मनुष्योंमें राजा, नदियों (जलाशयों)-में समुद्र, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य, पर्वतोंमें मेरु और पक्षियोंमें गरुड श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार देवलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें ऊपर-नीचे, दायें-बायें, जितने भी जगत्के आश्रय हैं, उन सबमें भगवान् श्रीकृष्ण ही श्रेष्ठ हैं ।। २६—२९ ।।