महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1911, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें**भीष्मजी बोले—**कुरुरत्न युधिष्ठिर! अब मैं वृष्णिवंशमें भगवान् नारायणके अवतार-ग्रहणका यथावत् वृत्तान्त कहूँगा। अजातशत्रो जातस्तु यथैष भुवि भूमिपः । कीर्त्यमानं मया तात निबोध भरतर्षभ ।। भरतकुलभूषण तात अजातशत्रो! वसुधाकी रक्षा करनेवाले ये भगवान् यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए? यह मैं बतला रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। सागराः समकम्पन्त मुदा चेलुश्च पर्वताः । जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ।। भगवान्के जन्मके समय आनन्दोद्रेकके कारण समुद्रमें उत्ताल तरंगें उठने लगीं, पर्वत हिलने लगे और बुझी हुई अग्नियाँ भी सहसा प्रज्वलित हो उठीं। शिवाः सम्प्रववुर्वाताः प्रशान्तमभवद् रजः । ज्योतींषि सम्प्रकाशन्ते जायमाने जनार्दने ।। भगवान् जनार्दनके जन्मकालमें शीतल, मन्द एवं सुखद वायु चलने लगी। धरतीकी धूल शान्त हो गयी और नक्षत्र प्रकाशित होने लगे। देवदुन्दुभयश्चापि सस्वनुर्भृशमम्बरे । अभ्यवर्षंस्तदाऽऽगम्य देवताः पुष्पवृष्टिभिः ।। आकाशमें देवलोकके नगाड़े जोर-जोरसे बजने लगे और देवगण आ-आकर वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे। गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरस्तुवन् मधुसूदनम् । उपतस्थुस्तदा प्रीताः प्रादुर्भावे महर्षयः ।। वे मंगलमयी वाणीद्वारा भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे। भगवान्के अवतारका समय जान महर्षिगण भी अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ आ पहुँचे। ततस्तानभिसम्प्रेक्ष्य नारदप्रमुखानृषीन् । उपानृत्यन्नुपजगुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। नारद आदि देवर्षियोंको उपस्थित देख गन्धर्व और अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं। उपतस्थे च गोविन्दं सहस्राक्षः शचीपतिः । अभ्यभाषत तेजस्वी महर्षीन् पूजयंस्तदा ।। उस समय सहस्र नेत्रोंवाले शचीवल्लभ तेजस्वी इन्द्र भगवान् गोविन्दकी सेवामें उपस्थित हुए और महर्षियोंका आदर करते हुए बोले।
इन्द्र उवाच कृत्यानि देवकार्याणि कृत्वा लोकहिताय च । स्वलोकं लोककृद् देव पुनर्गच्छ स्वतेजसा ।।