भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1932

भगवान् श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारणकर गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंका हित करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये।

तं प्रयान्तममित्रघ्नं देवाः सहपुरन्दराः ।।
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः स्तुवन्तो विष्णुमच्युतम् ।
शत्रुनाशन भगवान् श्रीकृष्णको प्रस्थान करते देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बड़े प्रसन्न हुए और अच्युत भगवान् कृष्णकी स्तुति करते हुए उन्हींके पीछे-पीछे चले।

सोऽग्रयान् रक्षोगणान् हत्वा नरकस्य महासुरान् ।।
क्षुरान्तान् मौरवान् पाशान् षट्सहस्रं ददर्श सः ।
भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुरके उन मुख्य-मुख्य राक्षसोंको मारकर मुर दैत्यके बनाये हुए छः हजार पाशोंको देखा, जिनके किनारोंके भागोंमें छुरे लगे हुए थे।

संछिद्य पाशांस्त्वस्त्रेण मुरं हत्वा सहानुवयम् ।।
शिलासंङ्घानतिक्रम्य निशुम्भमवपोथयत् ।
भगवान्ने अपने अस्त्र (चक्र)-से मुर दैत्यके पाशोंको काटकर मुर नामक असुरको उसके वंशजों-सहित मार डाला और शिलाओंके समूहोंको लाँघकर निशुम्भको भी मार गिराया।

यः सहस्रसमस्त्वेकः सर्वान् देवानयोधयत् ।।
तं जघान महावीर्यं हयग्रीवं महाबलम् ।