महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1934, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रवृत्तचक्रं चक्रेण प्रममाथ बलाद् बली ॥ बलवान् मधुसूदनने चक्र हाथमें लिये हुए नरकासुरके साथ दो घड़ीतक खिलवाड़ करके बलपूर्वक चक्रसे उसके मस्तकको काट डाला। चक्रप्रमथितं तस्य पपात सहसा भुवि । उत्तमाङ्गं हताङ्गस्य वृत्रे वज्रहते यथा ॥ चक्रसे छिन्न-भिन्न होकर घायल हुए शरीरवाले नरकासुरका मस्तक वज्रके मारे हुए वृत्रासुरके सिरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भूमिस्तु पतितं दृष्ट्वा ते वै प्रादाच्च कुण्डले । प्रदाय च महाबाहुमिदं वचनमब्रवीत् ॥ भूमिने अपने पुत्रको रणभूमिमें गिरा देख अदितिके दोनों कुण्डल लौटा दिये और महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा।
भूमिरुवाच
सृष्टस्त्वयैव मधुहंस्त्वयैव निहतः प्रभो । यथेच्छसि तथा क्रीडन् प्रजास्तस्यानुपालय ॥ **भूमि बोली—**प्रभो मधुसूदन! आपने ही इसे जन्म दिया था और आपने ही इसे मारा है। आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी ही लीला करते हुए नरकासुरकी संतानका पालन कीजिये।
श्रीभगवानुवाच