भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1937

भीष्म उवाच

निहत्य नरकं भौमं सत्यभामासहायवान् ।
सहितो लोकपालैश्च ददर्श नरकालयम् ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर सत्यभामासहित भगवान् श्रीकृष्णने लोकपालोंके साथ जाकर नरकासुरके घरको देखा।
अथास्य गृहमासाद्य नरकस्य यशस्विनः ।
ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥
यशस्वी नरकके घरमें जाकर उन्होंने नाना प्रकारके रत्न और अक्षय धन देखा।
मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यविकृतानि च ।
अश्मसारानर्कमणीन् विमलान् स्फाटिकानपि ॥
मणि, मोती, मूँगे, वैडूर्यमणिकी बनी हुई वस्तुएँ, पुखराज, सूर्यकान्तमणि और निर्मल स्फटिकमणिकी वस्तुएँ भी वहाँ देखनेमें आयीं।
जाम्बूनदमयान्येव शातकुम्भमयानि च ।
प्रदीप्तज्वलनाभानि शीतरश्मिप्रभाणि च ॥
जाम्बूनद तथा शातकुम्भसंज्ञक सुवर्णकी बनी हुई बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ वहाँ दृष्टिगोचर हुईं, जो प्रज्वलित अग्नि और शीतरश्मि चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रही थीं।
हिरण्यवर्णं रुचिरं श्वेतमभ्यन्तरं गृहम् ।
यदक्षयं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥
न हि राज्ञः कुबेरस्य तावद् धनसमुच्चयः ।
दृष्टपूर्वः पुरा साक्षान्महेन्द्रसदनेष्वपि ॥
नरकासुरका भीतरी भवन सुवर्णके समान सुन्दर, कान्तिमान् एवं उज्ज्वल था। उसके घरमें जो असंख्य एवं अक्षय धन दिखायी दिया, उतनी धनराशि राजा कुबेरके घरमें भी नहीं है। देवराज इन्द्रके भवनमें भी पहले कभी उतना वैभव नहीं देखा गया था।

इन्द्र उवाच

इमानि मणिरत्नानि विविधानि वसूनि च ॥
हेमसूत्रा महाकक्ष्यास्तोमरैर्वीर्यशालिनः ।
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवालविकृताः कुथाः ॥
विमलाभिः पताकाभिर्वासांसि विविधानि च ।
ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः ॥
इन्द्र बोले— जनार्दन! ये जो नाना प्रकारके माणिक्य, रत्न, धन तथा सोनेकी जालियोंसे सुशोभित बड़े-बड़े हौदोंवाले, तोमरसहित पराक्रमशाली बड़े भारी गजराज एवं उनपर बिछानेके लिये मूँगेसे विभूषित कम्बल, निर्मल पताकाओंसे युक्त नाना प्रकारके वस्त्र