महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1943, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंथे, उन सबके साथ मणिपर्वतको उखाड़कर इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने सब प्राणियोंके देखते-देखते गरुड़पर रख लिया। उपेन्द्रं बलदेवं च वासवं च महाबलम् । तं च रत्नौघमतुलं पर्वतं च महाबलः ।। वरुणस्यामृतं दिव्यं छत्रं चन्द्रोपमं शुभम् । स्वपक्षबलविक्षेपैर्महाद्रिशिखरोपमः ।। दिक्षु सर्वासु संरावं स चक्रे गरुडो वहन् । महाबली गरुड़ श्रीकृष्ण, बलराम तथा महाबलवान् इन्द्रको, उस अनुपम रत्नराशि तथा पर्वतको, वरुणदेवताके दिव्य अमृत तथा चन्द्रतुल्य उज्ज्वल शुभकारक छत्रको वहन करते हुए चल दिये। उनका शरीर विशाल पर्वतशिखरके समान था। वे अपनी पाँखोंको बलपूर्वक हिला-हिलाकर सब दिशाओंमें भारी शोर मचाते जा रहे थे। आरुजन् पर्वताग्राणि पादपांश्च समुत्क्षिपन् ।। संजहार महाभ्राणि वैश्वानरपथं गतः । उड़ते समय गरुड़ पर्वतोंके शिखर तोड़ डालते थे, पेड़ोंको उखाड़ फेंकते थे और ज्योतिषपथ (आकाश)-में चलते समय बड़े-बड़े बादलोंको अपने साथ उड़ा ले जाते थे। ग्रहनक्षत्रताराणां सप्तर्षीणां स्वतेजसा ।। प्रभाजालमतिक्रम्य चन्द्रसूर्यपथं ययौ । वे अपने तेजसे ग्रह, नक्षत्र, तारों और सप्तर्षियोंके प्रकाशपुंजको तिरस्कृत करते हुए चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर जा पहुँचे। मेरोः शिखरमासाद्य मध्यमं मधुसूदनः ।। देवस्थानानि सर्वाणि ददर्श भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मधुसूदनने मेरुपर्वतके मध्यम शिखरपर पहुँचकर समस्त देवताओंके निवासस्थानोंका दर्शन किया। विश्वेषां मरुतां चैव साध्यानां च युधिष्ठिर ।। भ्राजमानान्यतिक्रम्य अश्विनोश्च परंतप । प्राप्य पुण्यतमं स्थानं देवलोकमरिंदमः ।। युधिष्ठिर! उन्होंने विश्वेदेवों, मरुद्गणों और साध्योंके प्रकाशमान स्थानोंको लाँघकर अश्विनीकुमारोंके पुण्यतम लोकमें पदार्पण किया। परंतप! तत्पश्चात् शत्रुहन्ता भगवान् श्रीकृष्ण देवलोकमें जा पहुँचे। शक्रसद्म समासाद्य चावरुह्य जनार्दनः । सोऽभिवाद्यादितेः पादावर्चिताः सर्वदैवतैः ।। ब्रह्मदक्षपुरोगैश्च प्रजापतिभिरेव च ।