महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1961, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्त्वा ततः सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान् । सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासवः ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! समस्त कुकुर और अन्धकवंशके लोगोंसे ऐसा कहकर सबसे विदा ले देवराज इन्द्रने बलराम, श्रीकृष्ण और वसुदेवको हृदयसे लगाया। प्रद्युम्नसाम्बनिश्ठाननिरुद्धं च सारणम् । बभ्रुं झल्लिं गदं भानुं चारुदेष्णं च वृत्रहा ॥ सत्कृत्य सारणाक्रूरौ पुनराभाष्य सात्यकिम् । सस्वजे वृष्णिराजानमाहुकं कुकुराधिपम् ॥ प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सारण, बभ्रु, झल्लि, गद, भानु, चारुदेष्ण, सारण और अक्रूरका भी सत्कार करके वृत्रासुरनिषूदन इन्द्रने पुनः सात्यकिसे वार्तालाप किया। इसके बाद वृष्णि और कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनको गले लगाया। भोजं च कृतवर्माणमन्यांश्चान्धकवृष्णिषु । आमन्त्र्य देवप्रवरो वासवो वासवानुजम् ॥ तत्पश्चात् भोज, कृतवर्मा तथा अन्य अन्धकवंशी एवं वृष्णिवंशियोंका आलिंगन करके देवराजने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णसे विदा ली। ततः श्वेताचलप्रख्यं गजमैरावतं प्रभुः । पश्यतां सर्वभूतानामारुरोह शचीपतिः ॥ तदनन्तर शचीपति भगवान् इन्द्र सब प्राणियोंके देखते-देखते श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए। पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम् । मुखाडम्बरनिर्घोषैः पूरयन्नमिवासकृत् ॥ वह श्रेष्ठ गजराज अपनी गम्भीर गर्जनासे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्गलोकको बारंबार निनादित-सा कर रहा था। हैमयन्त्रमहाकक्ष्यं हिरण्मयविषाणिनम् । मनोहरकुथास्तीर्णं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ उसकी पीठपर सोनेके खंभोंसे युक्त बहुत बड़ा हौदा कसा हुआ था। उसके दाँतोंमें सोना मढ़ा गया था। उसके ऊपर मनोहर झूल पड़ी हुई थी। वह सब प्रकारके रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित था। अनेकशतरत्नाभिः पताकाभिरलङ्कृतम् । नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम् ॥ सैकड़ों रत्नोंसे अलंकृत पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसके मस्तकसे निरन्तर मदकी धारा इस प्रकार बहती रहती थी, मानो मेघ पानी बरसा रहा हो। दिशागजं महामात्रं काञ्चनस्रजमास्थितः ।