भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1978

उस समय सहदेवके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और अदृश्यरूपसे खड़े हुए देवताओंने 'साधु', 'साधु' कहकर उनके सत्‌साहसकी प्रशंसा की॥ ६ १/२॥

आविध्यदजितं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पकः॥ ७॥
सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारदः सर्वलोकवित्।
उवाचाखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वचः॥ ८॥
तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले—॥ ७-८॥

कृष्णं कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नराः।
जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न सम्भाष्याः कदाचन॥ ९॥
'जो मानव कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा नहीं करेंगे, वे जीते-जी ही मृतक-तुल्य समझे जायँगे। ऐसे लोगोंसे कभी बातचीत नहीं करनी चाहिये'॥ ९॥

वैशम्पायन उवाच

पूजयित्वा च पूजार्हान् ब्रह्मक्षत्रविशेषवित्।
सहदेवो नृणां देवः समापद्यत कर्म तत्॥ १०॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और क्षत्रियोंमें विशिष्ट व्यक्तियोंको पहचानने-वाले नरदेव सहदेवने क्रमशः पूज्य व्यक्तियोंकी पूजा करके वह अर्घ्यनिवेदनका कार्य पूरा कर दिया॥ १०॥

तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथः शत्रुकर्षणः।
अतिताम्रेक्षणः कोपादुवाच मनुजाधिपान्॥ ११॥
इस प्रकार श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जानेपर शत्रुविजयी शिशुपालने क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें करके समस्त राजाओंसे कहा—॥ ११॥

स्थितः सेनापतिर्योऽहं मन्यध्वं किं तु साम्प्रतम्।
युधि तिष्ठाम संनह्य समेतान् वृष्णिपाण्डवान्॥ १२॥
'भूमिपालो! मैं सबका सेनापति बनकर खड़ा हूँ। अब तुमलोग किस चिन्तामें पड़े हो। आओ, हम सब लोग युद्धके लिये सुसज्जित हो पाण्डवों और यादवोंकी सम्मिलित सेनाका सामना करनेके लिये डट जायँ'॥ १२॥

इति सर्वान् समुत्साह्य राज्ञस्तांश्चेदिपुङ्गवः।
यज्ञोपघाताय ततः सोऽमन्त्रयत राजभिः॥ १३॥
तत्राहूता गताः सर्वे सुनीथप्रमुखा गणाः।
समदृश्यन्त संक्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा॥ १४॥