महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1981, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें‘कुरुवंशके वीर! तुम डरो मत, क्या कुत्ता कभी सिंहको मार सकता है? हमने कल्याणमय मार्ग पहले ही चुन लिया है (श्रीकृष्णका आश्रय ही वह मार्ग है जिसका मैंने वरण कर लिया है)॥ ६॥
प्रसुप्ते हि यथा सिंहे श्वानस्तस्मिन् समागताः।
भषेयुः सहिताः सर्वे तथेमे वसुधाधिपाः॥ ७॥
वृष्णिसिंहस्य सुप्तस्य तथामी प्रमुखे स्थिताः।
‘जैसे सिंहके सो जानेपर बहुत-से कुत्ते उसके निकट आकर एक साथ भूँकने लगते हैं, उसी प्रकार ये सामने खड़े हुए राजा भी तभीतक भूँक रहे हैं, जबतक वृष्णिवंशका सिंह सो रहा है॥ ७ १/२॥
भषन्ते तात संक्रुद्धाः श्वानः सिंहस्य संनिधौ॥ ८॥
न हि सम्बुध्यते यावत् सुप्तः सिंह इवाच्युतः।
तेन सिंहीकरोत्येतान् नृसिंहश्चेदिपुङ्गवः॥ ९॥
पार्थिवान् पार्थिवश्रेष्ठः शिशुपालोऽप्यचेतनः।
सर्वान् सर्वात्मना तात नेतुकामो यमक्षयम्॥ १०॥
‘क्रोधमें भरे हुए कुत्तोंके समान ये लोग सिंहके निकट तभीतक कोलाहल मचा रहे हैं, जबतक भगवान् श्रीकृष्ण सिंहकी तरह जाग नहीं उठते—इन्हें दण्ड देनेके लिये उद्यत नहीं हो जाते। राजाओंमें श्रेष्ठ चेदिकुलभूषण नृसिंह शिशुपाल भी अपनी विवेकशक्ति खो बैठा है, तभी इन सब नरेशोंको यमलोकमें भेज देनेकी इच्छासे कुत्तेसे सिंह बनानेकी कोशिश कर रहा है॥ ८—१०॥
नूनमेतत् समादातुं पुनरिच्छत्यधोक्षजः।
यदस्य शिशुपालस्य तेजस्तिष्ठति भारत॥ ११॥
‘भारत! अवश्य ही भगवान् श्रीकृष्ण इस शिशुपालके भीतर उनका जो तेज है, उसे पुनः समेट लेना चाहते हैं॥ ११॥
विप्लुता चास्य भद्रं ते बुद्धिर्बुद्धिमतां वर।
चेदिराजस्य कौन्तेय सर्वेषां च महीक्षिताम्॥ १२॥
‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। अवश्य ही इस चेदिराज शिशुपालकी तथा इन समस्त भूपालोंकी बुद्धि मारी गयी है॥ १२॥
आदातुं च नरव्याघ्रो यं यमिच्छत्ययं तदा।
तस्य विप्लवते बुद्धिरेवं चेदिपतेर्यथा॥ १३॥
‘क्योंकि नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण जिस-जिसको अपनेमें विलीन कर लेना चाहते हैं, उस-उस मनुष्यकी बुद्धि इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे इस चेदिराज शिशुपालकी॥ १३॥
चतुर्विधानां भूतानां त्रिषु लोकेषु माधवः।
प्रभवश्चैव सर्वेषां निधनं च युधिष्ठिरः॥ १४॥