भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2000

महापराक्रमी भीष्मक, भूमिपाल दन्तवक्र, भगदत्त, यूपकेतु, जयत्सेन, मगधराज

सहदेव, विराट, द्रुपद, शकुनि, बृहद्वल, अवन्तीके राजकुमार विन्द-अनुविन्द, पाण्ड्यनरेश,

श्वेत, उत्तर, महाभाग शंख, अभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य तथा महारथी एवं

महाबली कलिंगनरेशकी अवहेलना करके कृष्णकी प्रशंसा क्यों कर रहे हो? ।। १९—२१ १/२

।।

शल्यादीनपि कस्मात् त्वं न स्तौषि वसुधाधिपान् ।

स्तवाय यदि ते बुद्धिर्वर्तते भीष्म सर्वदा ।। २२ ।।

भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुति करनेमें ही लगता है तो इन शल्य आदि

श्रेष्ठ राजाओंकी स्तुति क्यों नहीं करते? ।। २२ ।।

किं हि शक्यं मया कर्तुं यद् वृद्धानां त्वया नृप ।

पुरा कथयतां नूनं न श्रुतं धर्मवादिनाम् ।। २३ ।।

भीष्म! तुमने पहले बड़े-बूढ़े धर्मोपदेशकोंके मुखसे यदि यह धर्मसंगत बात, जिसे मैं

अभी बताऊँगा नहीं सुनी, तो मैं क्या कर सकता हूँ? ।। २३ ।।

आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः ।

अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ।। २४ ।।

भीष्म! अपनी निन्दा, अपनी प्रशंसा, दूसरेकी निन्दा और दूसरेकी स्तुति—ये चार

प्रकारके कार्य पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं ।। २४ ।।

यदस्तव्यामिमं शश्वन्मोहात् संस्तौषि भक्तितः ।

केशवं तच्च ते भीष्म न कश्चिदनुमन्यते ।। २५ ।।

भीष्म! जो स्तुतिके सर्वथा अयोग्य है, उसी केशवकी तुम मोहवश सदा भक्तिभावसे

जो स्तुति करते रहते हो, उसका कोई अनुमोदन नहीं करता ।। २५ ।।

कथं भोजस्य पुरुषे वर्गपाले दुरात्मनि ।

समावेशयसे सर्वं जगत् केवलकाम्यया ।। २६ ।।

दुरात्मा कृष्ण तो राजा कंसका सेवक है, उनकी गौओंका चरवाहा रहा है। तुम केवल

स्वार्थवश इसमें सारे जगत्का समावेश कर रहे हो ।। २६ ।।

अथ चैषा न ते बुद्धिः प्रकृतिं याति भारत ।

मयैव कथितं पूर्वं भूलिङ्गशकुनिर्यथा ।। २७ ।।

भारत! तुम्हारी बुद्धि ठिकानेपर नहीं आ रही है। मैं यह बात पहले ही बता चुका हूँ कि

तुम भूलिंग पक्षीके समान कहते कुछ और करते कुछ हो ।। २७ ।।

भूलिङ्गशकुनिर्नाम पार्श्वे हिमवतः परे ।

भीष्म तस्याः सदा वाचः श्रूयन्तेऽर्थविगर्हिताः ।। २८ ।।

भीष्म! हिमालयके दूसरे भागमें भूलिंग नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया रहती है। उसके

मुखसे सदा ऐसी बात सुनायी पड़ती है, जो उसके कार्यके विपरीत भावकी सूचक होनेके