महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2030, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुर्योधन उवाच
दृष्ट्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां युधिष्ठिरवशानुगाम् । जितामस्त्रप्रतापेन श्वेताश्वस्य महात्मनः ॥ २२ ॥ तं च यज्ञं तथाभूतं दृष्ट्वा पार्थस्य मातुल । यथा शक्रस्य देवेषु तथाभूतं महाद्युतेः ॥ २३ ॥ अमर्षेण तु सम्पूर्णो दह्यमानो दिवानिशम् । शुचिशुक्रागमे काले शुष्येत् तोयमिवाल्पकम् ॥ २४ ॥ दुर्योधनने कहा—मामाजी! मैंने देखा है, श्वेतवाहन महात्मा अर्जुनके अस्त्रोंके प्रतापसे जीती हुई यह सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके वशमें हो गयी है। महातेजस्वी युधिष्ठिरका वह राजसूययज्ञ उसी प्रकार सम्पन्न हुआ है, जैसे देवताओंमें देवराज इन्द्रका यज्ञ पूर्ण हुआ था। यह सब देखकर मैं दिन-रात ईर्ष्यासे भरा ठीक उसी प्रकार जलता रहता हूँ, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें थोड़ा-सा जल जल्दी सूख जाता है ॥ २२—२४ ॥ पश्य सात्वतमुख्येन शिशुपालो निपातितः । न च तत्र पुमानासीत् कश्चित् तस्य पदानुगः ॥ २५ ॥ और भी देखिये, यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णने शिशुपालको मार गिराया, परंतु वहाँ कोई भी वीर पुरुष उसका बदला लेनेको तैयार नहीं हुआ ॥ २५ ॥ दह्यमाना हि राजानः पाण्डवोत्थेन वह्निना । क्षान्तवन्तोऽपराधं ते को हि तत् क्षन्तुमर्हति ॥ २६ ॥