महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2055, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंहुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे।। ५-७ ।।
(यश्च स द्विजमुख्येन राज्ञः शङ्खो निवेदितः ।
प्रीत्या दत्तः कुणिन्देन धर्मराजाय धीमते ।।
द्विजोंमें प्रधान राजा कुणिन्दने परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरको बड़े प्रेमसे एक शंख निवेदन किया।
तं सर्वे भ्रातरो भ्रात्रे ददुः शङ्खं किरीटिने ।
तं प्रत्यगृह्लाद् बीभत्सुस्तोयजं हेममालिनम् ।।
चितं निष्कसहस्रेण भ्राजमानं स्वतेजसा ।
उस शंखको सब भाइयोंने मिलकर किरीटधारी अर्जुनको दे दिया। उसमें सोनेका हार जड़ा हुआ था और एक हजार स्वर्णमुद्राएँ मढ़ी गयी थीं। अर्जुनने उसे सादर ग्रहण किया। वह शंख अपने तेजसे प्रकाशित हो रहा था।
रुचिरं दर्शनीयं च भूषितं विश्वकर्मणा ।।
अधारयच्च धर्मश्च तं नमस्य पुनः पुनः ।
साक्षात् विश्वकर्माने उसे रत्नोंद्वारा विभूषित किया था। वह बहुत ही सुन्दर और दर्शनीय था। साक्षात् धर्मने उस शंखको बार-बार नमस्कार करके धारण किया था।
यो अन्नदाने नदति स ननादाधिकं तदा ।।
प्रणादाद् भूमिपास्तस्य पेतुर्हीनाः स्वतेजसा ।।