भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2073

न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च ।। २१ ।।

न च राजा पृथुर्वैन्यो न चाप्यासीद् भगीरथः ।

ययातिर्नहुषो वापि यथा राजा युधिष्ठिरः ।। २२ ।।

वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे।

भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ

था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँट दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु,

न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट् थे,

जैसे कि आज राजा युधिष्ठिर हैं ।। २०—२२ ।।

यथातिमात्रं कौन्तेयः श्रिया परमया युतः ।

राजसूयमवाप्यैवं हरिश्चन्द्र इव प्रभुः ।। २३ ।।

कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर राजसूययज्ञ पूर्ण करके अत्यन्त उच्चकोटिकी राजलक्ष्मीसे

सम्पन्न हो गये हैं। ये शक्तिशाली महाराज हरिश्चन्द्रकी भाँति सुशोभित होते हैं ।। २३ ।।

एतां दृष्ट्वा श्रियं पार्थे हरिश्चन्द्रे यथा विभो ।

कथं तु जीवितं श्रेयो मम पश्यसि भारत ।। २४ ।।

भारत! हरिश्चन्द्रकी भाँति कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी इस राजलक्ष्मीको देखकर मेरा

जीवित रहना आप किस दृष्टिसे अच्छा समझते हैं? ।। २४ ।।

अन्धेनेव युगं नद्धं विपर्यस्तं नराधिप ।

कनीयांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीयन्त एव च ।। २५ ।।

राजन्! यह युग अंधे विधातासे बँधा हुआ है। इसीलिये इसमें सब बातें उलटी हो रही

हैं। छोटे बढ़ रहे हैं और बड़े हीन दशामें गिरते जा रहे हैं ।। २५ ।।

एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामि शर्म

समीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर ।

तेनाहमेवं कृशतां गतश्च

विवर्णतां चैव सशोकतां च ।। २६ ।।

कुरुप्रवीर! ऐसा देखकर अच्छी तरह विचार करनेपर भी मुझे चैन नहीं पड़ता। इसीसे

मैं दुर्बल, कान्तिहीन और शोकमग्न हो रहा हूँ ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।

५३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक तिरपनवाँ

अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।