महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजकुमार! तुम द्यूतरूपी अनर्थको ही अर्थ मान रहे हो। यह जूआ कलहको ही गूँथनेवाला एवं अत्यन्त भयंकर है। यदि किसी प्रकार यह शुरू हो गया तो तीखी तलवारों और बाणोंकी भी सृष्टि कर देगा ।। १२ ।।
दुर्योधन उवाच
द्यूते पुराणैर्व्यवहारः प्रणीत- स्तत्रात्ययो नास्ति न सम्प्रहारः । तद् रोचतां शकुनेर्वाक्यमद्य सभां क्षिप्रं त्वमिहाज्ञापयस्व ।। १३ ।।
**दुर्योधन बोला—**पिताजी! पुराने लोगोंने भी द्यूतक्रीड़ाका व्यवहार किया है। उसमें न तो दोष है और न युद्ध ही होता है। अतः आप शकुनि मामाकी बात मान लीजिये और शीघ्र ही यहाँ (द्यूतके लिये) सभामण्डप बन जानेकी आज्ञा दीजिये ।। १३ ।।
स्वर्गद्वारं दीव्यतां नो विशिष्टं तद्वर्तिनां चापि तथैव युक्तम् । भवेदेवं ह्यात्मना तुल्यमेव दुरोदरं पाण्डवैस्त्वं कुरुष्व ।। १४ ।।
यह जूआ हम खेलनेवालोंके लिये एक विशिष्ट स्वर्गीय सुखका द्वार है। उसके आस-पास बैठनेवाले लोगोंके लिये भी वह वैसा ही सुखद होता है। इस प्रकार इसमें पाण्डवोंको भी हमारे समान ही सुख प्राप्त होगा। अतः आप पाण्डवोंके साथ द्यूतक्रीड़ाकी व्यवस्था कीजिये ।।
धृतराष्ट्र उवाच
वाक्यं न मे रोचते यत् त्वयोक्तं यत् ते प्रियं तत् क्रियतां नरेन्द्र । पश्चात् तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक्यं न हीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम् ।। १५ ।।
**धृतराष्ट्रने कहा—**बेटा! तुमने जो बात कही है, वह मुझे अच्छी नहीं लगती। नरेन्द्र! जैसी तुम्हारी रुचि हो, वैसा करो। जूएका आरम्भ करनेपर मेरी बातोंको याद करके तुम पीछे पछताओगे; क्योंकि ऐसी बातें जो तुम्हारे मुखसे निकली हैं, धर्मानुकूल नहीं कही जा सकतीं ।। १५ ।।
दृष्टं ह्येतद् विदुरेणैव सर्वं विपश्चिता बुद्धिविद्यानुगेन । तदेवैतदवशस्याभ्युपैति महद् भयं क्षत्रियजीवघाति ।। १६ ।।