भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 2095, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 2095

सैन्यमध्ये ययौ राजन् कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ द्रौपदीप्रमुखा नार्यः सानुगाः सपरिच्छदाः । आरुह्य ता विचित्राणि शिबिकानां शतानि च ॥ महत्या सेनया राजन्नग्रे राज्ञो ययुस्तदा । राजन्! कुरुराज युधिष्ठिर सेनाके बीचमें चल रहे थे। द्रौपदी आदि स्त्रियाँ अपनी सेविकाओं तथा आवश्यक सामग्रियोंके साथ सैकड़ों विचित्र शिबिकाओं (पालकियों)-पर आरूढ़ हो बड़ी भारी सेनाके साथ महाराजके आगे-आगे जा रही थीं। समृद्धनरनागाश्वं सपताकरथध्वजम् ॥ समृद्धरथनिस्त्रिंशं पत्तिभिर्घोषितस्वनम् । पाण्डवोंकी वह सेना हाथी-घोड़ों तथा पैदल सैनिकोंसे भरी-पूरी थी। उसमें बहुत-से रथ भी थे, जिनकी ध्वजाओंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। उन सभी रथोंमें खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र संगृहीत थे। पैदल सैनिकोंका कोलाहल सब ओर फैल रहा था। शङ्खदुन्दुभितालानां वेणुवीणानुनादितम् ॥ शुशुभे पाण्डवं सैन्यं प्रयातं तत् तदा नृप । राजन्! शंख, दुन्दुभि, ताल, वेणु और वीणा आदि वाद्योंकी तुमुल ध्वनि वहाँ गूँज रही थी। उस समय हस्तिनापुरकी ओर जाती हुई पाण्डवोंकी उस सेनाकी बड़ी शोभा हो रही थी। स सरांसि नदींश्चैव वनान्युपवनानि च ॥ अत्यक्रामन्महाराज पुरीं चाभ्यवपद्यत । हस्तीपुरसमीपे तु कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ जनमेजय! कुरुराज युधिष्ठिर अनेक सरोवर, नदी, वन और उपवनोंको लाँघते हुए हस्तिनापुरके समीप जा पहुँचे। चक्रे निवेशनं तत्र ततः स सहसैनिकः । शिवे देशे समे चैव न्यवसत् पाण्डवस्तदा ॥ वहाँ उन्होंने एक सुखद एवं समतल प्रदेशमें सैनिकोंसहित पड़ाव डाल दिया। उसी छावनीमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वयं भी ठहर गये। ततो राजन् समाहूय शोकविह्वलया गिरा । एतद् वाक्यं च सर्वस्वं धृतराष्ट्रचिकीर्षितम् । आचचक्षे यथावृत्तं विदुरोऽथ तपस्य ह ॥) राजन्! तदनन्तर विदुरजीने शोकाकुल वाणीमें महाराज युधिष्ठिरको वहाँका सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया कि धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं और इस द्यूतक्रीड़ाके पीछे क्या रहस्य है? धृतराष्ट्रेण चाहूतः कालस्य समयेन च ॥ २१ ॥

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