भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2100

शकुने! जुआरियोंका छल-कपटमें ही सम्मान होता है; सज्जन पुरुष वैसे सम्मानकी प्रशंसा नहीं करते। अतः तुम क्रूर मनुष्यकी भाँति अनुचित मार्गसे हमें जीतनेकी चेष्टा न करो ॥ ६ ॥

शकुनिरुवाच

यो वेत्ति संख्यां निकृतौ विधिज्ञ- श्चेष्टास्वखिन्नः कितवोऽक्षजासु । महामतिर्यश्च जानाति द्यूतं स वै सर्वं सहते प्रक्रियासु ॥ ७ ॥

**शकुनि बोला—**जिस अंकपर पासा पड़ता है, उसे जो पहले ही समझ लेता है, जो शठताका प्रतीकार करना जानता है एवं पासे फेंकने आदि समस्त व्यापारोंमें उत्साहपूर्वक लगा रहता है तथा जो परम बुद्धिमान् पुरुष द्यूतक्रीड़ाविषयक सब बातोंकी जानकारी रखता है, वही जूएका असली खिलाड़ी है; वह द्यूतक्रीड़ामें दूसरोंकी सारी शठतापूर्ण चेष्टाओंको सह लेता है ॥ ७ ॥

अक्षग्लहः सोऽभिभवेत् परं न- स्तेनैव दोषो भवतीह पार्थ । दीव्यामहे पार्थिव मा विशङ्कां कुरुष्व पाणं च चिरं च मा कृथाः ॥ ८ ॥

कुन्तीनन्दन! यदि पासा विपरीत पड़ जाय तो हम खिलाड़ियोंमेंसे एक पक्षको पराजित कर सकता है; अतः जय-पराजय दैवाधीन पासोंके ही आश्रित है। उसीसे पराजयरूप दोषकी प्राप्ति होती है। हारनेकी शंका तो हमें भी है, फिर भी हम खेलते हैं। अतः भूमिपाल! आप शंका न कीजिये, दाँव लगाइये, अब विलम्ब न कीजिये ॥

युधिष्ठिर उवाच

एवमाहायमसितो देवलो मुनिसत्तमः । इमानि लोकद्वाराणि यो वै भ्राम्यति सर्वदा ॥ ९ ॥ इदं वै देवनं पापं निकृत्या कितवैः सह । धर्मेण तु जयो युद्धे तत्परं न तु देवनम् ॥ १० ॥

**युधिष्ठिरने कहा—**मुनिश्रेष्ठ असित-देवलने, जो सदा इन लोकद्वारोंमें भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा कहा है कि जुआरियोंके साथ शठतापूर्वक जो जूआ खेला जाता है, पाप है। धर्मानुकूल विजय तो युद्धमें ही प्राप्त होती है; अतः क्षत्रियोंके लिये युद्ध ही उत्तम है, जूआ खेलना नहीं ॥ ९-१० ॥

नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया न चरन्त्युत । अजिह्यमशठं युद्धमेतत् सत्पुरुषव्रतम् ॥ ११ ॥