महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् ।
विधिश्च बलवान् राजन् दिष्ट्यास्मि वशे स्थितः ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने कहा— राजन्! मैं बुलानेपर पीछे नहीं हटता, यह मेरा निश्चित व्रत है। दैव बलवान् है। मैं दैवके वशमें हूँ ॥ १८ ॥
अस्मिन् समागमे केन देवनं मे भविष्यति ।
प्रतिपाणश्च कोऽन्योऽस्ति ततो द्यूतं प्रवर्तताम् ॥ १९ ॥
अच्छा तो यहाँ जिन लोगोंका जमाव हुआ है, उनमें किसके साथ मुझे जूआ खेलना होगा? मेरे मुकाबलेमें बैठकर दूसरा कौन पुरुष दाँव लगायेगा? इसका निश्चय हो जाय, तो जूएका खेल प्रारम्भ हो ॥ १९ ॥
दुर्योधन उवाच
अहं दातास्मि रत्नानां धनानां च विशाम्पते ॥ २० ॥
मदर्थे देविता चायं शकुनिर्मातुलो मम ।
दुर्योधन बोला— महाराज! दाँवपर लगानेके लिये धन और रत्न तो मैं दूँगा; परंतु मेरी ओरसे खेलेंगे ये मेरे मामा शकुनि ॥ २० १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अन्येनान्यस्य वै द्यूतं विषमं प्रतिभाति मे ।
एतद् विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम् ॥ २१ ॥
युधिष्ठिरने कहा— दूसरेके लिये दूसरेका जूआ खेलना मुझे तो अनुचित ही प्रतीत होता है। विद्वन्! इस बातको समझ लो, फिर इच्छानुसार जूएका खेल प्रारम्भ हो ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरशकुनिसंवादे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरशकुनिसंवादविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥