महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतद् राजन् मम धनं प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव । येन मां त्वं महाराज धनेन प्रतिदीव्यसे ॥ ७ ॥
राजन्! मेरी ओरसे यही धन दाँवपर रखा गया है। इसके बदलेमें तुम्हारी ओरसे कौन-सा धन दाँवपर रखा जाता है, जिस धनके द्वारा तुम मेरे साथ खेलना चाहते हो ॥
दुर्योधन उवाच
सन्ति मे मणयश्चैव धनानि सुबहूनि च । मत्सरश्च न मेऽर्थेषु जयस्वैनं दुरोदरम् ॥ ८ ॥ **दुर्योधन बोला—**मेरे पास भी मणियाँ और बहुत-सा धन है, मुझे अपने धनपर अहंकार नहीं है। आप इस जूएको जीतिये ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो जग्राह शकुनिस्तानक्षानक्षतत्त्ववित् । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पासे फेंकनेकी कलामें अत्यन्त निपुण शकुनिने उन पासोंको हाथमें लिया और उन्हें फेंककर युधिष्ठिरसे कहा—'लो, यह दाँव मैंने जीता' ॥ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्यूतारम्भे षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें द्यूतारम्भविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥